जरूरी नहीं कि हमें सब पता हो, लेकिन फिर भी दोस्तों के सामने यह बताने में जैसे हमारा कद घट जाता है कि फलां मुद्दे के बारे में तो मैं कुछ जानता/जानती ही नहीं. कुछ है जो हमें ये स्वीकारने से रोकता है कि हम सब नहीं जानते. सोशल मीडिया के दौर में तो ज्ञान के उबाल में काफी इज़ाफा हो गया है. हालांकि फेसबुक के पदार्पण से पहले भी हम किसी भी बात पर अपने ज्ञान को जरूरत से ज्यादा आंकने की गलती करते आए हैं.

The Knowledge Illusion : Why we never think alone: इस किताब के लेखक स्लोमन की रिसर्च इसी मुद्दे पर बात करती है और कहती है कि हम अकेले नहीं सोचते. स्लोमन, कॉग्नाइटिव साइंटिस्ट यानि ज्ञान संबंधी मामलों पर शोध करने वाले वैज्ञानिक हैं. स्लोमन की रूचि खासतौर पर ‘गहराई को जानने के हमारे भ्रम’ में हैं. साधारण शब्दों में कहें तो हमें भ्रम है कि - दुनिया को लेकर हमारी समझ काफी गहरी और सही है. स्लोमन के मुताबिक हमें यह खुशफहमी इसलिए है क्योंकि हम दूसरों के दिमाग पर ज्यादा भरोसा करते हैं.

हम दूसरे की सोच पर निर्भर
जो फैसले, जो धारणाएं, जो सोच हम बनाते हैं, वो बहुत कुछ-दूसरे क्या सोच रहे हैं- पर निर्भर करती है. आपने भी देखा होगा कि एक बात जिसे लेकर आसपास के लोग नकारात्मक हैं, हम भी बिना सोचे समझें उसे गलत मानने लगते हैं. भीड़ का किसी को मारना इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं. बगैर जाने कि मामला क्या है, कई बार लोग सिर्फ इसलिए किसी को पीटने लग जाते हैं क्योंकि बाकी के लोग उसे मार रहे हैं. ऐसे में असम जैसे मामले सामने आते हैं जब भीड़ ने दो बेकसूर नौजवानों को बच्चों का अपहरण करने वाला समझकर पीट पीटकर मार डाला.

वॉक्स वेबसाइट पर प्रकाशित एक बातचीत में स्लोमन कहते हैं कि किसी भी बात को लेकर हमारा रवैया ज़मीनी हकीकत के बजाय सामाजिक समूहों के आधार पर ज्यादा बनता है. हम ज्यादा तर्कों में नहीं फंसते. ज्यादा से ज्यादा लोग तो सोचना भी पसंद नहीं करते. हम तथ्यों पर गौर न करके, पूरी जान अपनी धारणा को सही साबित करने पर लगा देते हैं.

  • मसलन व्हाट्सऐप पर आपको कोई मैसेज भेजता है कि जण गण मण को सर्वश्रेष्ठ राष्ट्रगान का यूनेस्को अवॉर्ड मिला है.
  • बदले में आप उन्हें जानकारी मुहैया करवाते हैं कि इस तरह का कोई सम्मान यूनेस्को द्वारा नहीं दिया जाता, साथ में आप उसे वो लिंक भेजते हैं जिसमें यूनेस्को का इस खबर के खंडन में बयान होता है
  • लेकिन बदले में व्यक्ति आपको ऐसे पांच और व्हाट्सएप मैसेज बढ़ा देता है जो पहले वाले मैसेज की सच्चाई का जिम्मा लिए दिखते हैं.
  • मैसेज भेजने वाला व्यक्ति आपके द्वारा भेजे गए लिंक्स पर भरोसा न करके, अपने भेजे गए व्हाट्सएप को सच साबित करने में जुट जाता है.

यह सच है कि किसी मुद्दे पर जब आप बहुमत से अलग चलने की 'गुस्ताख़ी' करते हैं तो उसका खामियाज़ा भुगतना पड़ता है. आपको लेकर एक धारणा बनने लग जाती है और इससे बचने के लिए आप सामाजिक दबाव में आते हैं जो ज्ञान संबंधी हमारी जिम्मेदारी पर कुछ इस तरह असर डालता है कि हमें पता भी नहीं चलता.

 

सुपरहिट फिल्म 'शोले' जो कि अमूमन सभी लोगों को पसंद आती है. लेकिन ऐसे में अगर किसी को वो फिल्म बहुत ज्यादा पसंद न आई हो तो उसे तुरंत कटघरे में खड़ा कर दिया जाता है. उसकी फिल्मी समझ को लेकर सवाल उठाये जाने लगते हैं. ऐसे में व्यक्ति को अपनी भलाई शोले को बेहतरीन कहने में ही नज़र आती है. धीरे धीरे हम खुद से सोचना बंद कर देते हैं औऱ ज्यादातर उसी दिशा में चल पड़ते हैं जिसमें बाकी की दुनिया जा रही होती है.

हम में से कितने लोग हैं जो जीएसटी की पेचीदगियों को समझते हैं, लेकिन इसके बावजूद फेसबुक और ट्विटर पर हम लगातार उसके पक्ष या विपक्ष में लड़ रहे होते हैं. इन सबके लिए हम दूसरों के ज्ञान पर निर्भर हैं. मैंने जो किसी का लिखा पढ़ा या किसी एक्सपर्ट को सुना या अखबार या वेबसाइट पर कोई लेख पढ़ा या फिर व्हाट्सएप का कोई फॉर्वर्ड पढ़ा. क्या हमने खुद ने जीएसटी कानून को पढ़ा है. नहीं,न ही हमने जाकर किसी व्यापारी से उसके व्यावहारिक लाभ या हानि को समझा. ऐसे में किसी भी सरकारी नीति को लेकर हमारी बनाई गई धारणाएं भी काफी हद तक दूसरों की सोच के हिसाब से तय होती है.

इसके खतरे के बारे में बात करते हुए स्लोमन ने जो कहा उसका सार कुछ यह था -  हम सब एक दूसरे की समझ पर भरोसा करके खुद को समझदार समझ लेते हैं जबकि शायद हम में से किसी को ये भी नहीं पता कि असल में बात किस चीज़ की हो रही है. हालांकि कुछ लोग ऐसा नहीं भी करते और वो तमाम तरह की बहुमत राय के बावजूद तथ्यों को समझकर अपनी विचार बनाने में विश्वास रखते हैं.

लेकिन क्या दूसरे के ज्ञान पर भरोसा करना गलत है
शायद हमारे पास इसके अलावा कोई चारा नहीं है. शायद हमारी पहुंच ही बहुत सीमित है. हमारे पास जानने और समझने के लिए बहुत कुछ है लेकिन सब कुछ जान लेना मुमकिन नहीं है. इसलिए हम दूसरों पर निर्भर हैं. यह एक बहुत ही व्यावहारिक बात है. हमारे पास क्या इतना वक्त है कि हम जीएसटी को समझने के लिए कानून की किताबें पढ़ें. हम किसी एक्सपर्ट या मीडिया की राय पर ही यकीन करना होगा. लेकिन ट्विस्ट यहीं है. हमें भुलावे में रहने की जरूरत नहीं है. अगर हमें कोई मामला समझ नहीं आया, तो खुद को इस भुलावे में रखने की जरूरत नहीं कि समझ आ गया है.

हम सब कहीं न कहीं सही कहलाना पसंद करते हैं लेकिन कुछ लोगों के लिए यह बात इतनी जरूरी हो जाती है कि वह ऐसे विचार और घटनाओं का समर्थन करने लगते हैं जो किसी भी तरह न्यायसंगत नहीं होते. जैसे कुछ महीनों पहले कश्मीर में 8 साल की बच्ची के साथ हुआ बलात्कार और हत्या का मामला जिसमें अभियुक्त के पक्ष में नारे लगाए गए थे. बाद में ऐसा करने वाले बीजेपी के दो नेताओं को इस मामले में इस्तीफा भी देना पड़ गया था.

सोशल मीडिया ने और बिगाड़ा काम
ऊपर से दिखने में लगता है कि सोशल मीडिया ने सूचना का एक नया रास्ता खोल दिया है. लेकिन दरअसल उसने हमें और अधिक कुएं का मेंढक बनाकर रख दिया है. उदाहरण के तौर पर फेसबुक पर देखकर हमें लगता है कि अमेरिका में ट्रंप को नापसंद करने वालों की भीड़ है, अमेरिका की आधी से ज्यादा मीडिया ट्रंप के खिलाफ में बोलती नजर आती है. अगर हम गहराई में न जाएं तो यह मानकर चलना आसान है कि पूरा अमेरिका ट्रंप के खिलाफ है. जबकि स्लोमन के मुताबिक 44% अमेरिकी अभी भी मीडिया से ज्यादा ट्रंप की बातों में यकीन रखते हैं.

इंटरनेट पर हमारे ज्ञान की सीमा और कम होती जा रही है क्योंकि हम अपने ही तरह सोचने वालों के साथ रहना पसंद करते हैं. एक जैसी सोच वालों के समूह बन रहे हैं. मसलन,खुद को इन्सेल्स बताने वालों का ऑनलाइन समूह - ये वो लड़के हैं जो खुद के कुंवारे या सेक्स में असफल रहने के लिए लड़कियों को जिम्मेदार ठहराते हैं. उनका मानना है कि लड़कियां बेहतर दिखने वाले लड़कों की तरफ आकर्षित होती हैं. सुनने में हास्यास्पद लग सकता है लेकिन इन्सेल्स अपनी असफलता की वजह लड़कियों को बताते हुए उनके साथ बलात्कार किए जाने को भी सही ठहराते हैं. हैरानी की बात है कि सोशल मीडिया पर इन्सेल्स के साथ हमदर्दी जताने वाले लोग भी काफी तादाद में हैं.

वहीं खबरों का व्यक्ति विशेष के हिसाब कस्टमाइज़ होकर दिखाया जाना भी अच्छा नहीं है. यानि अगर मैं कुछ खास वेबसाइट की खबरें देखती हूं तो किसी मुद्दे का दूसरा पहलू चाहकर भी नहीं समझ सकती क्योंकि गूगल मुझे लगातार उसी वेबसाइट की खबरें और फीड दिखाता रहेगा जिसे मैं अभी तक देखती आ रही हूं. मेरे सामने उन वेबसाइट की खबरें आएंगी ही नहीं, जिन्हें मैंने अभी तक नहीं देखा. दूसरे शब्दों में कहूं तो गूगल ये मानकर चलता है कि मैं दूसरा पहलू समझना ही नहीं चाहती.