इंटरनेट डेस्क, पूर्वजों के लिए जो श्रद्धा से किया जाता है, उसे श्राद्ध कहते हैं। जो लोग श्राद्ध करते हैं वे स्वयं भी सुखी-सम्पन्न होते हैं और उनके पितरों को भी खुशी प्राप्त होती है। क्या आप जानते हैं भगवान राम ने भी अपने पिता का श्राद्ध किया था। भगवान राम वनवास के समय जब पुष्कर में ठहरे थे तो उसी समय उनके पिता दशरथ के श्राद्ध की तिथि आई। राम ने अपने पिता का श्राद्ध करने के लिए ऋषि-मुनियों, ब्राह्मणों को आमंत्रित किया और उन्हें कंदमूल परोसे, जब सीता जी ब्राह्मणों को भोजन परोसने लगीं तो वे अचानक भयभीत होकर झाड़ियों में चली गईं। भगवान राम ने लक्ष्मण की मदद से ब्राह्मणों को भोजन कराया। जब ब्राह्मण सब चले गए तो डरी-डरी सीता जी आईं।

तब भगवान राम ने सीता जी से इस अनुचित व्यवहार का कारण पूछा तो सीता जी कहा ‘‘नाथ! जब मैं ब्राह्मणों को कंदमूल परोसने गई तो उन ब्राह्मणों में मुझे अपने ससुर जी की छवी दिखाई दी, ऐसे में मैं उनके सामने कैसे आ सकती थी इसी कारण शर्म वश में बाहर चली गई, माना जाता है कि जिसका श्राद्ध हो वो स्वयं ब्राह्मणों के रूप में श्राद्ध करने के लिए आता है, इसी कारण जिसका श्राद्ध किया जाता है उसके पसंद की चीजें ब्राह्मणों को खिलाई जाती हैं, इस कथा का वर्णन पुराणों में मिलता है।