जयपुर, प्रभु और गुरु के प्रति सच्ची श्रद्धा ही सम्यकदर्शन कहलाती है। समर्पण मनुष्य को उन्नतशील बनाता है और जब एक बीज समर्पण करता है तो वह वृक्ष रूप में परिणत हो जाता है। ये विचार गणिनी आर्यिका गौरवमती माताजी ने व्यक्त किए। वे टोंक रोड के गोनेर रोड स्थित अतिशय क्षेत्र बाड़ा पदमपुरा दिगम्बर जैन मंदिर में चल रहे चातुर्मास के दौरान 36वें दिन सोमवार सुबह स्वाध्याय सभा में प्रवचन कर रही थीं। इस सभा में मुनि पीयूष सागर महाराज ने भी उपदेश दिए।

गौरवमती माताजी ने कहा कि बूंद जब मिटती है तो वह सागर बन जाती है। उसी प्रकार मनुष्य जब समर्पण करता है तो त्याग अपने आप ही करने लगता है। जैसे- बीज ने अपना त्याग किया तो वृक्ष बन गया, मिट्टी ने अपना त्याग किया घड़ा बन गया और बून्द ने अपना त्याग किया तो सागर बन गया। उसी प्रकार जब मनुष्य श्रद्धा और समर्पण करता है तो वह स्वार्थ, मोह, लोभ आदि- इत्यादि का त्याग अपने आप ही करने लगता है, बस जरुरत है तो सच्ची श्रद्धा और समर्पण की। 

मुनि पीयूष सागर ने अपने उपदेश में कहा कि आराधना और विश्वास ही इस जग के सबसे बड़े हितैषी है जो श्रद्धा और समर्पण की राह पर ले जाते है, जो इस राह पर चलता है वह त्याग, तप और साधना को परिभाषित कर लेता है। 

समिति अध्यक्ष सुधीर जैन ने बताया की मंगलवार 15 अगस्त को प्रातः 8 बजे से अतिशय क्षेत्र बाड़ा पदमपुरा की धरा पर देश की आजादी का 70वां पावन पर्व अंतर्मना मुनि प्रसन्न सागर महाराज के मंगल आशीर्वाद से एवं मुनि पीयूष सागर महाराज और गणिनी आर्यिका गौरवमती माताजी ससंघ के सानिध्य में मनाया जायेगा, जिसमे पदमपुरा और आस - पास के स्कूलों के बच्चे सहित जयपुर जैन समाज सम्मिलित होगा।