नई दिल्ली: देश के पूर्व उप-प्रधानमंत्री और दलितों के मसीहा बाबू जगजीवन राम की पुण्यतिथि 6 जुलाई को थी। उनकी पुण्यतिथि पर विपक्ष की तरफ से राष्ट्रपति पद की उम्मीदवार और पूर्व लोकसभा स्पीकर मीरा कुमार ने श्रद्धांजलि अर्पित की। आपको बता दें कि मीरा कुमार बाबू जगजीवन राम की पुत्री भी हैं। आइए इस मौके पर हम आपको बाबूजी के जीवन के खास पहलुओं के बारे में बताते हैं- ‘जगजीवन राम’ जिन्हें आम तौर पर बाबूजी के नाम से जाना जाता है। जब वो विद्यालय में ही थे तब उनके पिता का स्वर्गवास हो गया था और उनका पालन-पोषण उनकी माता जी को करना पड़ा। वे एक राष्ट्रीय नेता, स्वतंत्रता सेनानी, सामाजिक न्याय के योद्धा, दलित वर्ग के समर्थक, उत्कृष्ट सांसद, सच्चे लोकतंत्रवादी, उत्कृष्ट केंद्रीय मंत्री, योग्य प्रशासक और असाधारण मेधावी वक्ता थे।

उन्होंने भारतीय राजनीति में अपनी प्रतिबद्धता, समर्पण और निष्ठा के साथ काम किया। जगजीवन राम का जन्म शोभी राम और बसंती देवी के यहां 5 अप्रैल, 1908 को बिहार के शाहाबाद जिले (अब भोजपुर) के एक छोटे से गांव चंदवा में हुआ था। जगजीवन राम को आदर्श मानवीय मूल्य और सूझबूझ अपने पिता से विरासत में मिली जो धार्मिक प्रवृत्ति के थे अैर शिव नारायणी मठ के महंत थे।

अपनी माताजी के मार्गदर्शन में जगजीवन राम ने आरा टाउन स्कूल से प्रथम श्रेणी में मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण की। जाति आधारित भेदभाव का सामना करने के बावजूद जगजीवन राम ने बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से विज्ञान में इंटर की परीक्षा सफलतापूर्वक उत्तीर्ण की और तत्पश्चात, कलकत्ता विश्वविद्यालय से स्नातक की परीक्षा पास की। वर्ष 1934 में, उन्होंने कलकत्ता में अखिल भारतीय रविदास महासभा और अखिल भारतीय दलित वर्ग लीग की स्थापना की। इन संगठनों के माध्यम से उन्होंने दलित वर्गों को स्वतंत्रता संग्राम में शामिल कराया। उनका विचार था कि दलित नेताओं को न केवल समाज सुधार के लिए संघर्ष करना चाहिए बल्कि राजनीतिक, प्रतिनिधित्व की मांग भी करनी चाहिए। अगले वर्ष अर्थात 19 अक्टूबर, 1935 में बाबूजी रांची में हेमंड आयोग के समक्ष उपस्थित हुए और पहली बार दलितों के लिए मतदान के अधिकार की मांग की।

बाबू जगजीवन राम ने स्वतंत्रता संग्राम में अत्यंत सक्रिय और महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। गांधीजी से प्रेरणा पाकर बाबूजी ने 10 दिसम्बर, 1940 को अपनी गिरफ्तारी दी। रिहा होने के बाद उन्होंने सविनय अवज्ञा आंदोलन और सत्याग्रह में सक्रिय रूप से भाग लिया। बाबूजी को इंडियन नेशनल कांग्रेस द्वारा आरंम्भ किए गए भारत छोड़ो आन्दोलन में सक्रिय रूप से भाग लेने के लिए 19 अगस्त 1942 को पुनः गिरफ्तार कर लिया गया।

उन्होंने छात्र कार्यकर्ता और स्वतंत्रता सेनानी के रूप में अपना सार्वजनिक जीवन आरंभ किया और 1936 में 28 वर्ष की अवस्था में बिहार विधान परिषद के मनोनीत सदस्य के रूप में विधायक बन गए। पुनः वर्ष 1936 में वह दलित वर्ग लीग उम्मीदवार के रूप में खड़े हुए। उनको 10 दिसंबर, 1936 को मध्य पूर्व शाहाबाद (ग्रामीण) निर्वाचन क्षेत्र से बिहार विधान सभा के लिए निर्विरोध निर्वाचित घोषित किया गया। वर्ष 1937 में, जब कांग्रेस सरकार का गठन हुआ तब बाबूजी को शिक्षा और विकास मंत्रालय में संसदीय सचिव नियुक्त किया गया। तथापि, 1938 में पूरे मंत्रिमंडल के साथ उन्होंने भी अपने पद से त्याग पत्र दे दिया।

बाबू जगजीवन राम वर्ष 1946 में पुनः निर्विरोध निर्वाचित हुए और उन्हें 2 दिसम्बर, 1946 को श्रम मंत्री के रूप में अंतरिम सरकार में शामिल किया गया। इसके पश्चात, लगभग 31 वर्षों तक वे केंद्रीय मंत्रिमंडल के सदस्य रहे। 1937 से ही उन्होंने इंडियन नेशनल कांग्रेस में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। स्वतंत्रता प्राप्ति से पूर्व बाबूजी कांग्रेस पार्टी में राज्य स्तर पर महत्वपूर्ण पदों पर रहे।

स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात वे पार्टी की धुरी बन गए और पार्टी कार्यकलापों और साथ ही देश के शासन के लिए अपरिहार्य बन गए। 1940 से 1977 तक वे अखिल भारतीय कांग्रेस समिति के सदस्य थे और वर्ष 1948 से 1977 तक कांग्रेस कार्यकारी समिति के सदस्य रहे। वे 1950 से 1977 तक केंद्रीय संसदीय बोर्ड के सदस्य रहे। 6 जुलाई 1986 को 78 साल की उम्र में इस महान राजनीतिज्ञ का निधन हो गया।

वह बिहार के एक छोटे से गांव की माटी की उपज थे, जहां उन्होंने खेतिहर मजदूरों का त्रासदी (अटैक) से भरा जीवन देखा था। स्टूडेंट के रूप में कोलकाता में मिल मजदूरों की दयनीय स्थिति से भी उनका साक्षात्कार हुआ था। बाबूजी ने श्रम मंत्री के रूप में मजदूरों की जीवन स्थितियों में आवश्यक सुधार लाने और उनकी सामाजिक, आर्थिक सुरक्षा के लिए विशेष कानूनी नियम बनवाए, जो आज भी हमारे देश की श्रम-नीति का आधार है।

बाबू जगजीवन राम को भारतीय समाज और राजनीति में दलित वर्ग के मसीहा के रूप में याद किया जाता है। वह स्वतंत्र भारत के उन गिने-चुने नेताओं में थे जिन्होंने देश की राजनीति के साथ ही दलित समाज को भी नई दिशा दी।