राजस्थान:राजस्थान में ऊंट केवल एक पशु नहीं बल्कि यहां की परम्परा और संस्कृति का हिस्सा है. ढोला-मारू, पाबूजी, बाबा रामदेव, खिमवाजी और महेन्द्र-मूमल जैसे लोकगीत तो ऊंटों को आधार मान कर रचे ही गये हैं. राजस्थानी काव्य और पहेलियों में भी ऊंटों का अहम स्थान देखने को मिलता है. लेकिन राजस्थान की यह शान अब संकट में है. राज्य पशु का दर्जा दिये जाने के बावजूद प्रदेश में ऊंटों का कुनबा लगातार कम होता जा रहा है. जल्द ही पशु गणना शुरू होने जा रही है और इस बार ऊंटों की संख्या में फिर से गिरावट होने के आसार हैं.

पशुपालन विभाग को अलग-अलग जिलों से जो रिपोर्ट मिल रही है उसके मुताबिक प्रदेश में अब ऊंटों की संख्या घटकर ढाई से तीन लाख के बीच रह सकती है. ऊंटों का घटता कुनबा राज्य सरकार के लिये चिन्ता का विषय है. यही वजह है कि प्रदेश में ना सिर्फ ऊंट को राज्य पशु का दर्जा दिया गया है बल्कि ऊंट के वध और निर्यात पर भी रोक लगाई गई है.

देश में ऊंटों की तस्वीर

- देश के करीब 82 फीसदी ऊंट राजस्थान में पाये जाते हैं.

- साल 1961 में राजस्थान में ऊंटों की संख्या करीब 10 लाख थी.
- साल 1991 तक राजस्थान में ऊंटों की संख्या 8-10 लाख के बीच रही.
- इसके बाद ऊंटों की संख्या में गिरावट का दौर शुरू हो गया.
- साल 2003 में ऊंटों की संख्या घटकर 4 लाख 98 हजार रह गई.
- साल 2007 में प्रदेश में ऊंटों का कुनबा घटकर 4 लाख 22 हजार रह गया
- साल 2012 आते-आते प्रदेश में ऊंटों की संख्या महज 3 लाख 26 हजार रह गई
- साल 2012 की पशुगणना के अनुसार प्रदेश में 1.47 लाख नर और 1.78 लाख मादा ऊंट हैं

पशुपालक ऊंटनी को नहीं होने देते गर्भवती
राजस्थान में ऊंटों की घटती संख्या के पीछे एक बड़ी वजह यह भी है कि पशुपालक अब ऊंटनी को गर्भवती ही नहीं होने देते. दरअसल ऊंटनी का करीब 13 महीने का गर्भकाल होता है. इस दौरान उसे करीब 4 महीने पूरी तरह आराम की जरुरत होती है. चूंकि इस दौरान पशुपालक को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है. लिहाजा वह उसके गर्भवती होने से परहेज करता है. अब सरकार ऊंटनी के बच्चा पैदा करने पर पशुपालक को 10 हजार की सहायता दे रही है. यही वजह है कि साल 2016-17 में 8663 और साल 2017-18 में 13 हजार 368 ऊंटनियों के बच्चे पैदा हुये हैं.

हाशिए पर आया ऊंट
राजस्थान में ड्रोमेडेरी प्रजाति का ऊंट पाया जाता है जो एक कूबड़ वाला होता है. दुनिया में 94 प्रतिशत ऊंट इसी प्रजाति के हैं. प्रदेश में सबसे ज्यादा ऊंट जैसलमेर और बाड़मेर जिले में हैं. वहां सरहद की रक्षा के साथ ही पर्यटन के लिहाज से इनका उपयोग हो रहा है. ऊंट की शारीरिक बनावट इस तरह की होती है कि वह ना सिर्फ मरुस्थल में गुजारा कर सकता है, बल्कि कारगर भी साबित हो सकता है. लेकिन बदले समय के साथ बदले मायनों ने अब रेगिस्तान के जहाज को हाशिये पर लाकर खड़ा कर दिया है.