मुंबई: मोदी सरकार के कार्यकाल का शुक्रवार को आखिरी बजट पेश किया गया. इस बजट के माध्यम से सरकार की कोशिश रही कि हर वर्ग को खुश और संतुष्ट कर सके, ताकि आने वाले लोकसभा चुनाव में इसका फायदा ले सके. बजट के बाद तमाम विपक्षी दलों ने इसे आखिरी जुमला बताया. वहीं, बीजेपी की सहयोगी पार्टी शिवसेना ने सराहना की है. शिवसेना ने अपने मुखपत्र 'सामना' में लिखा है कि देशभर के लोगों को जिसकी उम्मीद थी. मोदी सरकार ने वो करके दिखा दिया. 

सामना में लिखा है कि देशभर में इस वर्ष भले ही कम बरसात हुई है फिर भी लोकसभा चुनाव से पहले आखिरी बजट में मोदी सरकार घोषणाओं की बारिश करेगी, यही उम्मीद थी. वित्त विभाग का अतिरिक्त कामकाज संभालने वाले रेलमंत्री पीयूष गोयल द्वारा शुक्रवार को रखे गए ‘अंतरिम’ बजट ने अपेक्षाओं को भंग नहीं किया है. यह बजट ‘अंतरिम’ था फिर भी चुनाव से पहले सरकार के लिए यह आखिरी मौका होने से उसका स्वरूप ‘पूर्ण बजट’ जैसा रखा जाएगा और इस मौके का पूर्णत: लाभ उठाने की कोशिश सरकार द्वारा की जाएगी, ये काले पत्थर की सफेद लकीर थी.

अंतरिम बजट पर नजर डालने पर ऐसा लगता है कि मोदी सरकार ने इस पर स्पष्ट लकीर खींचने की कोशिश की है. नोटबंदी तथा अन्य आर्थिक नीतियों के कारण गरीब-मध्यम वर्ग से लेकर किसान-मजदूर तक और आम नौकरीपेशा से लेकर व्यावसायिक-उद्योगपतियों तक सभी घटक मोदी सरकार से नाराज हैं. ऊपर से बीच के दिनों में पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव का झटका सत्ताधारी दल को लगा इसलिए इन नाराज घटकों को खुश करने की कोशिश इस बजट में की गई है. 

नौकरीपेशा लोगों को मिली राहत पर मुखपत्र में लिखा है कि 5 लाख रुपए तक की आय को करमुक्त करने का एक बड़ा निर्णय घोषित किया गया है. 80 (क) धारा के तहत मिलनेवाली कर छूट का विचार करते हुए कर सीमा को साढ़े ६ लाख तक बढ़ा दिया गया है. स्टैंडर्ड डिडक्शन 40 हजार से 50 हजार रुपए कर दिया गया है. दूसरे मकान को करमुक्त कर दिया गया है. प्रोविडेंड फंड जिनका कटता है, उन कर्मचारियों को प्रधानमंत्री श्रमयोगी योजना के तहत 6 लाख की आयुर्बीमा सुरक्षा, ग्रेच्युटी की सीमा 10 लाख से 20 लाख, ‘एचआरए’ पर कर में छूट जैसी अन्य कई घोषणाएं देश के करीब 3 करोड़ मध्यमवर्गीय नौकरीपेशा लोगों को नजरों के सामने रखकर की गई हैं.

किसानों को आम बजट पर मिली सौगातों पर सामना में लिखा है कि दो हेक्टेयर की खेतीवाले किसानों के खाते में प्रतिवर्ष 6 हजार रुपए की आर्थिक सहायता जमा कराने का निर्णय सरकार ने लिया है. इसके अलावा 21 हजार वेतन पानेवाले असंगठित क्षेत्र के मजदूरों को 7 हजार रुपए बोनस, 60 वर्ष पूर्ण करनेवाले मजदूरों को प्रतिमाह 3 हजार रुपए पेंशन दी जानेवाली है. यह निर्णय देश के करोड़ों किसानों और मजदूर-श्रमिकों को सीधा लाभ देनेवाला है, ‘क्रांतिकारी’ है, ऐसा सरकार का दावा है. इस पर बेवजह आपत्ति जताने की जरूरत नहीं लेकिन, अल्प भूधारक और श्रमिकों के खाते में जब पैसा जमा होगा तब सरकार का दावा और वादा सच होगा, ऐसा कहा जा सकता है और यह भी सच ही है.

बैंक और अन्य जमापूंजी पर कर योग्य ब्याज की मर्यादा को 10 हजार रुपए से 40 हजार रुपए करके सरकार ने वरिष्ठ नागरिकों को राहत दी है. कई वर्षों से प्रलंबित ‘वन रैंक-वन पेंशन’ योजना लागू की गई है. सैनिकों की पेंशन दोगुनी कर दी गई है. रक्षा विभाग के लिए किया गया 3 लाख करोड़ से भी अधिक का प्रावधान आज तक का सबसे बड़ा होने का दावा वित्तमंत्री ने किया है. अन्य कई घोषणाएं और दावे अंतरिम बजट में किए गए हैं. उसे पूरा करने का ‘संकल्प’ भी वित्तमंत्री ने जताया है. 

अब अंतरिम बजट की इन ‘कोटि-कोटि उड़ानों’ को पूरा करने के लिए लगने वाला पैसा सरकार के पास है क्या, उसे सरकार वैसे लाएगी, वित्तीय घाटा एक मर्यादा में ही रखने का वित्तमंत्री का प्रयास सफल होगा क्या, ऐसे सवाल पूछे जा रहे हैं. पर सरकार ने उस पर भी विचार किया ही होगा. सरकार ने अपने आखिरी बजट में घोषणाओं की ‘बारिश’ की है. उनका उद्देश्य लोकसभा चुनाव के लिए राजनीतिक ‘मेहनत’ है, फिर भी उसका लाभ समाज के सभी घटकों को होने वाला है. अंतरिम बजट की मर्यादा और लोकसभा चुनाव की कसरत संभालते हुए मोदी सरकार द्वारा प्रस्तुत किया गया ‘बजट’ वोटों का ही है!