अमावस्या के दिन भगवान राम अयोध्या पहुंचे थे। उनके स्वागत की तैयारी में अयोध्या के नर-नारियों ने घर-आंगन सजाया और खुद भी सजे-संवरे। इस तिथि को रूप चौदस भी कहा जाता है।

 

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रूप चौदस क्यों?

  • पौराणिक महत्व : ऋतु बदलती है और शरीर को नई ऋतु के लिए तैयार करने के मकसद से दीपोत्सव का यह दिन तन-मन को सजाने-संवारने के लिए नियत किया गया। एक दिन बाद लक्ष्मी के स्वागत के लिए ही यह जरूरी है क्योंकि महालक्ष्मी साफ-सुथरे घर और मन में ही प्रवेश करती हैं।
  • रूपांतरण के अर्थात् : दैनिक भास्कर ने रूप चौदस के पौराणिक महत्व को ध्यान मेंं रखते हुए रूप के इस उत्सव का नाट्य रूपांतरण किया।

रूप चौदस से जुड़ी मान्यता और परंपराएं
सूर्योदय से पहले स्नान
 : ब्रह्म पुराण में कहा गया है कि जो व्यक्ति रूप चौदस के दिन सूर्य निकलने से पहले अच्छी तरह स्न्नान करता है वो जीवन भर रोगों से दूर रहता है।

 

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  • घर साफ करें : कहते हैं कि दीपावली की रात लक्ष्मी भूलोक पर घूमती है और जिस घर में सफाई देखती हैं, वहां रुक जाती हैं। इससे एक दिन पहले यानी नरक चतुदर्शी को लक्ष्मी की बहन दरिद्रा भूलोक पर घूमती हैं और जिस घर में गंदगी देखती हैं, वहीं डेरा डाल लेती है। इसलिए नरक चतुर्दशी के दिन घर-आंगन को पूरी तरह साफ करने की परंपरा है ताकि किसी भी कोने में गंदगी न रह जाए।
  • तिल्ली के तेल की मालिश : नरक चतुदर्शी के दिन घर का हर सदस्य स्नान से पहले तिल्ली के तेल को थोड़े से पानी में मिलाकर बदन पर मालिश करे। कहा जाता है कि तिल्ली के तेल में लक्ष्मी और जल में गंगा का निवास होता है।
  • हल्दी कुमकुम का उपाय : स्नान से पहले नहाने के पानी में चुटकी भर हल्दी और कुमकुम डालकर वरुण देवता का ध्यान करें और फिर स्नान करें। माना जाता है कि ऐसा करने से घर के सदस्य दीर्घायु होते हैं।
  • पति पत्नी मंदिर जाएं : रूप चौदस के दिन पति-पत्नी के भगवान विष्णु और भगवान कृष्ण के एक साथ दर्शन करने की भी परंपरा है।
  • हल्दी का उबटन : नरक चतुदर्शी के दिन हल्दी और चंदन का उबटन लगाने की भी परंपरा है। माना जाता है कि ऐसा करने से रूप और सौंदर्य बढ़ता है।

 

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