नई दिल्ली:मुंशी प्रेमचंद का असली नाम धनपत राय था। धनपत राय से प्रेमचंद बनने का किस्सा कुछ यूं है कि जब उनका पहला कहानी संग्रह 'सोजे वतन' छपा तो अंग्रेज सरकार ने इसे देशद्रोही साहित्य कहकर इस पर प्रतिबंध लगा दिया। इसके बाद वो धनपन राय की जगह प्रेमचंद के नाम से लिखने लगे।

सोजे वतन में पांच कहानियां थीं। पहली कहानी का नाम थे - दुनिया का सबसे अनमोल रतन। ये कहानी एक अफगान प्रेमी की है, जिसकी प्रेमिका कहती है कि अगर उसका प्रेम दुनिया का सबसे अनमोल रतन ले आया तो वो उससे शादी कर लेगी। वो पहले मां के आंसू और फिर पति के साथ सती हुई स्त्री की भस्म लाता है। लेकिन प्रेमिका कहती है कि इन चीजों का महत्व तो है, लेकिन ये दुनिया का सबसे अनमोल रतन नहीं है।

इसके बाद प्रेमिका एक आखिरी मौका देती है, इस शर्त के साथ कि अगर प्रेमी दुनिया का सबसे अनमोल रतन नहीं ला पाया तो उसका सिर काट दिया जाएगा। इस बार प्रेमी पंजाब में देश की आजादी के लिए लड़ रहे एक सिपाही से मिलता है। उस सिपाही के हाथ पैर कट गए हैं। सीना छलनी है और उससे खून की धारा बह रही है। धीरे धीरे सारा खून बह गया। मरने से पहले सिपाही ने धीमे से कहा – भारत माता की जय और उसके सीने से उसके सीने से खून का आखिरी कतरा छलक उठा।

प्रेमचंद लिखते हैं कि बेशक दुनिया में खून के इस कतरे से ज्यादा अनमोल चीज कोई नहीं हो सकती। प्रेमी खून के उस कतरे को ले जाकर अपनी प्रेमिका के हाथ में रखा और पूरी कहानी सुनाई। प्रेमिका उसके गले लग गई और बोली कि 'आज से तू मेरा मालिक और मैं तुम्हारी पत्नी।' कहानी कि अंतिम लाइन इस तरह है- खून का वह आखिरी कतरा जो वतन की हिफाजत में गिरे, दुनिया की सबसे अनमोल चीज है।

निजी जीवन में देशभक्ति
ऐसा नहीं है कि प्रेमचंद की देशभक्ति केवल उनके किस्से कहानियों में थी। उनका असल जीवन भी ऐसा ही था। प्रेमचंद की पत्नी शिवरानी देवी ने अपनी किताब 'प्रेमचंद घर में' में लिखा है कि हेली साहब गवर्नर होकर आए थे और वो प्रेमचंद को रायसाहबी देना चाहते थे। उन्होंने अपनी पत्नी से कहा, 'साहब बहादुर मुझे रायबहादुरी देना चाहते हैं।' उनकी पत्नी ने कहा, 'लीजिए शौक से रायसाहबी। खाली रायसाहबी देंगे कि और भी कुछ?' प्रेमचंद बोले, 'इशारा तो और भी कुछ के लिए है।' इस पर पत्नी ने कहा, 'तब लीजिए न।'

प्रेमचंद बोले, 'तब मैं जनता का आदमी न रहकर एक पिट्ठू रह जाऊंगा।' पत्नी ने कहा, 'कैसा पिट्ठू?' प्रेमचंद ने जवाब दिया, 'उसी तरह, जैसे और लोग हैं। अभी तक मेरा सारा काम जनता के लिए है। तब सरकार मुझसे जो लिखवाएगी, लिखना पड़ेगा।' अंत में उन्होंने रायसाहबी लेने से मना कर दिया। प्रेमचंद ने अपना साहित्य हम तक पहुंचाने के लिए जो अनेकों बलिदान किए, उसका ये सिर्फ एक उदाहरण है। उन्होंने अपने लिए रायसाहबी नहीं ली, ताकि हमें उनका अमूल्य साहित्य मिल सके।