नई दिल्लीःआज की पीढ़ी में कुछ ही ऐसे बच्चे होंगे जो खुदीराम बोस का नाम जानते होंगे, लेकिन एक समय ऐसा भी था जब बंगाल में खुदीराम बोस के नाम से प्रिंटेड धोती चलन में हुआ करती थीं। लोग उनके नाम की धोती पहनने में गर्व महसूस करते थे। और करें भी क्यों न, खुदीराम बोस नाम ही ऐसा है। जिस उम्र में बच्चे खेल, पढ़ाई और दोस्ती के बारे में सोचते थे उसी उम्र में खुदीराम बोस ने अंग्रेजों के छक्के छुड़ा दिये थे। महज 16 साल की उम्र में ही उनके नाम का अंग्रेजों के बीच ऐसा खौफ था कि नाम सुनते ही उनका नामोनिशान मिटा देना चाहते थे, लेकिन इसके लिए अंग्रेजों को काफी इंतजार करना पड़ा।

18 वर्ष की आयु में फांसी
अमर शहीद खुदीराम बोस में वतन के लिए मर मिटने का जज्बा कुछ ऐसा था कि उनके बगावती सुर सुनकर अंग्रेज भी घबरा गए थे। बता दें आज ही के दिन अंग्रेजों ने मात्र 18 वर्ष की आयु में उन्हें फांसी पर लटका दिया था। वहीं खुदीराम बोस की शहादत के बाद पूरे देश में देश प्रेम की लहर दौड़ पड़ी। खास कर के बंगाल में बंगाल पर उनकी शहादत का असर कुछ ऐसा हुआ कि बंगाल के जुलाहे खुदीराम बोस के नाम की बॉर्डर वाली धोती बुनने लगे और चाहे युवा हो या बच्चा हर कोई इस धोती को बड़ी शान से पहनता और सीना तानकर चलने लगा।

छोटी उम्र में ही हो गया माता-पिता का निधन
बता दें अमर शहीद खुदीराम बोस का जन्म 3 दिसंबर 1889 को बंगाल के मिदनापुर जिले के हबीबपुर गांव में हुआ था। वहीं जब वह काफी छोटे थे उनके माता-पिता का निधन हो गया। माता-पिता के निधन के बाद खुदीराम को उनकी बड़ी बहन ने ही पाला-पोसा। वहीं बंगाल विभाजन के बाद महज 16 साल की उम्र में खुदीराम स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़े और अंग्रेजों के खिलाफ जुलूसों में शामिल होने लगे और अंग्रेजों के खिलाफ जमकर नारेबाजी करने लगे।

1906 में पहली बार अंग्रेजों ने उन्हें पर्चे बांटते पकड़ा
1905 में ही खुदीराम बोस ने रेवोल्यूशन पार्टी ज्वॉइन कर ली और जगह-जगह अंग्रेजों के खिलाफ पर्चे बांटने लगे। वहीं 1906 में पहली बार अंग्रेजों ने उन्हें पर्चे बांटते पकड़ लिया। जिसके बाद काफी जद्दोजहद के बाद वह अंग्रेजों की पकड़ से भाग निकले। अंग्रेजों ने मई 1906 में पहली बार उन्हें गिरफ्तार किया, लेकिन उम्र कम होने के चलते अंग्रेजों को उन्हें छोड़ना पड़ा। अंग्रेजों की गिरफ्त से निकलने के बाद खुदीराम के बगावती सुर और भी तेज हो गए। जिसके चलते अंग्रेजों में भी खुदीराम के प्रति खौफ पैदा हो गया।

स्वतंत्रता सेनानियों ने बनाई किंग्सफोर्ड की हत्या की साजिश
उन्होंने दिसंबर 1907 में बंगाल के नारायणगढ़ रेलवे स्टेशन पर हुए बम विस्फोट में भी हिस्सा लिया। नारायणगढ रेलवे स्टेशन पर हुए बम बिस्फोट के बाद कोलकाता में किंग्सफोर्ड चीफ प्रेसिडेंट क्रांतिकारियों को लेकर काफी सख्त हो गया। जिसके बाद स्वतंत्रता सेनानियों ने किंग्सफोर्ड की हत्या की योजना बनाई और इसके लिए खुदीराम बोस और प्रफुल्ल चंद को चुना गया। हत्या के लिए पहले तो खुदीराम और प्रफुल्ल चंद ने किंग्सफोर्ड पर नजर रखना शुरू कर दिया और फिर एक दिन मौका मिलते ही किंग्सफोर्ड की बग्घी पर बम फेंक दिया।

पूसा रोड रेलवे स्टेशन के पास खुदीराम गिरफ्तार हुए
किंग्सफोर्ड को मरा समझकर खुदीराम और प्रफुल्ल चंद वहां से भागने लगे, लेकिन उस दिन बग्घी में किंग्सफोर्ड नहीं बल्कि दो महिलाएं थीं। जिनकी इस हमले में मौत हो गई। वहीं हमला करने के बाद खुदीराम करीब 25 मील तक भागे, लेकिन कुछ दूरी पर अंग्रेज सैनिकों को खुदीराम पर शक हो गया। जिसके बाद पूसा रोड रेलवे स्टेशन के पास अंग्रेजों ने खुदीराम और प्रफुल्ल चंद को घेर लिया। खुद को घिरा देखकर प्रफुल्ल चंद ने खुद को गोली मार ली, लेकिन खुदीराम पकड़े गए।

13 जून 1908 को खुदीराम को फांसी की सजा सुनाई गई
पकड़े जाने के बाद खुदीराम पर हत्या का केस चलाया गया। जिसमें करीब 5 दिन तक चले मुकदमे के बाद खुदीराम को दोषी पाया गया। 8 जून को खुदीराम को अदालत में पेश किया गया। जिसके बाद 13 जून 1908 को खुदीराम को फांसी की सजा सुनाई गई। इतिहासकारों के मुताबिक खुदीराम को जब फांसी की सजा सुनाई गई उनके चेहरे पर मुस्कान थी। देश प्रेम ऐसा कि फांसी के लिए नई धोती सिलवाई थी, जैसे जन्म दिवस मना रहे हों। 11 अगस्त 1908 को खुदीराम को फांसी दी गई।

18 वर्ष की आयु में फांसी
बता दें जिस समय उन्हें फांसी की सजा दी गई थी उनकी उम्र मात्र 18 वर्ष थी। खुदीराम को जब फांसी की सजा दी जानी थी वह हंसते हुए फांसी के फंदे की तरफ चले। नई धोती पहनकर वह ऐसे मुस्कुरा रहे थे मानो फांसी की सजा नहीं कोई उत्सव मनाने जा रहे हों। खुदीराम को फांसी दिये जाने के बाद बंगाल में चारों ओर बगावत के सुर उठने लगे। लोगों ने खुदीराम के नाम से प्रिंटेड बॉर्डर वाली धोती पहनना शुरू कर दिया और बंगाल में अंग्रेजों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। इतिहासकारों के मुताबिक खुदीराम फांसी पर चढ़ने वाले सबसे कम उम्र के क्रांतिकारी थे। उन्हें मुज्जफरपुर जेल में उन्हें फांसी दी गई।