नई दिल्ली:  आम चुनाव को अब 6-7 महीने ही बचे हैं और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अब पूरी तरह सक्रिय हो गया है। अपने पुराने तमाम रिकॉर्ड तोड़ते हुए। नई शैली में। संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत पिछले जून से ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की देशभर में स्वीकार्यता बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं। इसके तहत संघ ने 7 जून को नागपुर में अपने एक कार्यक्रम में विपरीत विचारधारा से जुड़े पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी को बतौर मुख्य अतिथि आमंत्रित किया। इसके बाद एक कार्यक्रम में संघ ने रतन टाटा को भी आमंत्रित किया। हाल ही में संघ ने दिल्ली में ‘भविष्य का भारत और आरएसएस का दृष्टिकाेण’ कार्यक्रम रखा। इसमें राहुल गांधी, मायावती, ममता बनर्जी को आमंत्रण दिया गया। हालांकि, वे नहीं आए। 


संघ ने संभवत: पहली बार दिल्ली से बाहर इस तरह का कार्यक्रम किया था, जिसमें आम लोगों से सवाल भी लिए गए। संवेदनशील माने जाने वाले मुद्दों पर भी भागवत ने जवाब दिए। माना जा रहा है कि आरएसएस उन तबकों को साथ जोड़ना चाहता है जो संघ की कट्टरपंथी छवि होने के कारण उससे दूर रहते हैं। अब तक केवल नागपुर से बयान आते थे। अब संघ देशभर में कार्यक्रम करने लगा है। दिल्ली में हुए सम्मेलन में भागवत ने इस बात को सिरे से नकार दिया कि संघ भाजपा का रिमोट कंट्रोल है और वह उसके लिए काम करता है। हालांकि, यह कोई नई बात नहीं है। इससे पहले के सरसंघचालक भी यह सब कहते रहे हैं और दूसरी तरफ दखल भी देते रहे हैं।

भागवत ने कहा कि संघ से निकलकर जो लोग राजनीति या सत्ता में गए हैं, वे वरिष्ठ हैं। उन्हें हमारी सलाह या निर्देशों की जरूरत नहीं है। लेकिन दावा किया जाता है कि अब तक दो बार संघ खुलकर अपने से जुड़े राजनीतिक दल के समर्थन में आया। पहली बार ऐसा 1977 में हुआ, जब अापातकाल लगा था। दूसरा मौका 2014 में आया जब मोदी को प्रधानमंत्री बनाने के लिए संघ के स्वयंसेवकों ने पूरे देश में जोर लगा दिया। 2014 में अप्रैल-मई में लोकसभा चुनाव हुए थे। अब 2019 के लाेकसभा चुनाव में छह महीने बचे हैं और भागवत के बयानों से यह साफ है कि संघ खुद तो वैसा ही है। शायद रहेगा भी। लेकिन लोगों की अपने बारे में धारणा बदलने में लगा हुआ है।

भागवत के हाल ही के कुछ बयानों के जरिए संघ के तेवरों में आए बदलावों के बारे में बता रहा है...

भागवत : ‘‘हिंदू राष्ट्र का मतलब यह नहीं कि इसमें मुस्लिम नहीं रहेगा। जिस दिन ऐसा कहा जाएगा, उस दिन हिंदुत्व नहीं रहेगा। हिंदुत्व वसुधैव कुटुम्बकम की बात करता है।’’
मायने
 : 72 लोकसभा सीटों पर मुस्लिमों का सीधा असर है। इसलिए भागवत यह धारणा तोड़ना चाहते हैं कि संघ सिर्फ हिंदुओं की बात करता है और उसकी संकल्पना वाले हिंदू राष्ट्र में मुस्लिमों के लिए कोई जगह नहीं है। दिसंबर 2017 तक भागवत की लाइन यह थी कि भारत में रहने वाले सभी मुस्लिम मूल रूप से हिंदू हैं। अब वे इसकी जगह हिंदुत्व शब्द का इस्तेमाल कर रहे हैं। 

भागवत : ‘‘हम संघ का दबदबा नहीं चाहते। हम लोग सर्वलोक युक्त भारत वाले लोग हैं, मुक्त वाले नहीं हैं।’’
मायने
 : भाजपा कांग्रेस मुक्त भारत का नारा देती है। भागवत का बयान बताता है कि संघ कांग्रेस मुक्त भारत के नारे को ठंडा करना चाहता है।

भागवत : ‘‘संविधान सम्मत सभी तरह के आरक्षण को संघ का पूरा समर्थन है।’’
वजह 
: 150 से ज्यादा लोकसभा सीटों पर असर डालने वाले 17% दलित वोटरों की एससी/एसटी कानून के मुद्दे पर नाराजगी दूर करने की कोशिश। 2015 के बयान की भी भरपाई, जब भागवत ने कहा था कि आरक्षण नीति पर पुनर्विचार की जरूरत है। माना गया था कि इस बयान से बिहार विधानसभा चुनाव में भाजपा को नुकसान हुआ। इससे पहले संघ हमेशा आर्थिक आधार पर आरक्षण का पक्षधर रहा है।

भागवत: ‘‘संघ हमेशा तिरंगे का सम्मान करता है, लेकिन भगवा ध्वज हमारा गुरु है।’’
मायने
 : यह संदेश देना चाहते हैं कि संघ राष्ट्रवादी संगठन जरूर है, लेकिन भगवा यानी हिंदुत्व उसका कोर है।

 

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भागवत : ‘‘संघ चाहता है कि राम जन्मभूमि पर भव्य मंदिर जल्द बने। राम केवल बहुसंख्यकों के भगवान ही नहीं हैं, उन्हें लोग इमाम-ए-हिंद भी मानते हैं।’’
मायने 
: यह संदेश कि संघ ने मूल मुद्दा नहीं छोड़ा। लेकिन इमाम-ए-हिंद का जिक्र कर मुस्लिमों की भी रजामंदी चाहते हैं।

भागवत : ‘‘लोग कयास लगाते हैं कि नागपुर से सरकार के पास फोन जाता होगा। यह बिल्कुल गलत है। भाजपा की राजनीति पर हमारा प्रभाव नहीं है।’’
मायने 
: माेदी सरकार का रिमोट कंट्रोल संघ के पास है, यह धारणा तोड़ना चाहते हैं।

भागवत : ‘‘आरएसएस के संस्थापक डॉ. हेडगेवार कांग्रेस के आंदोलन में दो बार जेल गए, उसके कार्यकर्ता भी रहे।’’
मायने
 : आजादी के आंदोलन में कांग्रेस की अहमियत थी। संघ के संस्थापक उसका सम्मान करते थे। कुल मिलाकर, यह कांग्रेस के वोटरों को भी तोड़ने की कोशिश है।

भागवत : ‘‘कांग्रेस ने स्वतंत्रता आंदोलन में बड़ी भूमिका निभाई। देश को कई महान हस्तियां दीं।’’
मायने 
: संघ ने जून में प्रणब मुखर्जी को न्योता दिया था। आरएसएस की तुलना मुस्लिम ब्रदरहुड से करने वाले राहुल गांधी को भी आमंत्रण दिया। राहुल नहीं आए। लेकिन संघ यह बताना चाहता था कि उसके दरवाजे सभी के लिए खुले हैं।

भागवत : ‘‘गाय को खुला छोड़ने पर उपद्रव होगा तो गोरक्षा से जुड़ी आस्था पर प्रश्न चिह्न लगेगा।’’
वजह
 : गोरक्षा के नाम पर मॉब लिंचिंग की घटनाओं से संघ से जुड़े लोगों का संबंध नहीं होने की सफाई।

भागवत : ‘‘यदि कोई शेर अकेला होता है तो जंगली कुत्ते भी उस पर हमला कर उसे अपना शिकार बना सकते हैं।’’ - हिंदुओं से एकजुट होने की अपील के दौरान
प्रतिक्रिया 
: विपक्ष ने इसे आक्रामक और आपत्तिजनक बयान बताया। इसकी तुलना दंगों के संदर्भ में दिए मोदी के उस बयान से की गई कि ‘कोई कुत्ता भी गाड़ी के नीचे आ जाए तो दुख होता है।’ 

 

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संघ के बारे में

स्थापना 1925
मौजूदा सरसंघचालक मोहन भागवत
शाखाएं लगभग 60,000, साल 2017 के मुकाबले 1800 शाखाएं बढ़ी
प्रचारक 6,000