जयपुर:भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने पिछले दिनों दावा किया था कि राजस्थान में अंगद के पांव की तरह जमे रहेंगे। उनका इशारा अगले विधानसभा चुनाव के लिए था। शाह का दावा कितना सच होगा ये तो भविष्य के गर्भ में है, लेकिन मारवाड़-गोडवाड़ यानी पाली-जालोर-सिरोही जिले में कई जनप्रतिनिधि जरूर अंगद के पांव की तरह सालों से सियासत में जमे हुए हैं। एक रिपोर्ट-

मारवाड़, गोडवाड़ की बात करें तो यहां की सियासत लम्बी पारी खेलने वालों के गिर्द घूमती दिखती है। पाली व बाली विधायक चार बार तथा रेवदर विधायक लगातार तीन बार जीत कर प्रदेश की पंचायत में प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। वहीं, जैतारण विधायक सियासत के ऐसे योद्धा हैं जिन्होंने अब तक लगातार आठ चुनाव लड़े हैं, जिसमें पांच बार सफलता हासिल की है। तीनों ही जिलों में राजनीति के ऐसे कई और खिलाड़ी है जो तीन और दो बार से चुनाव जीत रहे हैं और अगली पारी खेलने के लिए भी जुटे हुए हैं। मारवाड़, गोडवाड़ की राजनीति का एक अजीब संयोग रहा है। दो दशक की राजनीति में लम्बी पारी खेलने वाले ज्यादातर भाजपा के विधायक है।

सुमेरपुर से चार बार विधायक रहीं बीना काक एक मात्र कांग्रेस की नेता है जो लगातार टिकी हुई हैं। वे सुमेरपुर विधानसभा से अब तक लगातार 7 चुनाव लड़ चुकी है, उसमें चार बार जीतने में कामयाब हुई। तीन बार हार का भी सामना करना पड़ा। अब अगले चुनाव में उतरने के लिए भी वह सक्रिय है। जैतारण विधायक सुरेन्द्र गोयल राजनीति के मंझे खिलाड़ी हैं। उन्होंने वर्ष 1980 में निर्दलीय के तौर पर पहला चुनाव लड़ा था। उसके बाद से वे लगातार भाजपा से प्रत्याशी रहे हैं। वर्ष 1985 और 2008 में उन्हें हार का सामना करना पड़ा था। जबकि 1990, 1993, 1998, 2003 व 2013 में उन्होंने जीत दर्ज कराई। उनकी जीत के पीछे जातिगत समीकरण, कांग्रेस की गुटबाजी सबसे बड़ा कारण रहा है। वहीं रेवदर विधायक जगसीराम की पकड़ भी मजबूत है। वे लगातार तीन बार से जीत दर्ज करा रहे। सुमेरपुर से विधायक मदन राठौड़ दो चुनाव लड़े और दोनों बार विजयी रहे हैं। भीनमाल से मौजूदा विधायक पूराराम अब तक पांच चुनाव लड़े। तीन चुनाव जीते और दो बार हारे। मारवाड़ जंक्शन से भाजपा के विधायक केसाराम तीन बार विधायक चुने गए। 2003 में हार मिली।

सोजत से संजना आगे लगातार दो बार से विधायक हैं। सिरोही से ओटाराम देवासी लगातार दो बार से विधायक हैं। चार बार के योद्धाओं की बात करें तो ज्ञानचंद पारख पाली विधानसभा से लगातार चार चुनाव जीत चुके हैं। भाजपा से चुनाव लडऩे वाले पारख ने 1998 में विधानसभा चुनाव के लिए राजनीतिक पारी की शुरूआत की थी। उसके बाद वर्ष 2003, 2008 व 2013 का चुनाव जीता। पारख कांग्रेस के शासन में भी अपनी सीट बरकरार रखने में सफल रहे हैं। उनकी जीत की वजह सक्रियता, सहज उपलब्ध, चिकित्सा के क्षेत्र में बेहतर काम, आमजन से सीधा जुड़ाव और कांग्रेस की गुटबाजी का फायदा भी मिला है।

बाली की बात करें तो तत्कालीन मुख्यमंत्री भैरोंसिंह शेखावत के उप राष्ट्रपति बनने के बाद रिक्त हुई बाली विधानसभा सीट से पुष्पेंद्र सिंह राणावत ने वर्ष 2002 में अपना सफर शुरू किया था। उप चुनाव में विजयी हुए। उसके बाद से लगातार चुनाव जीतते आ रहे हैं। वे अब तक लगातार चार बार से बाली विधानसभा का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। इनकी जीत की वजह सहज, विनम्र, आमजन से सीधा जुड़ाव, आदिवासी इलाके में पकड़, कांग्रेस का स्थायी और मजबूत चेहरा नहीं होना है। बहरहाल इनमें से अधिकांश एक बार फिर मैदान में होंगे। हालांकि इस बार हालात कुछ अलग है लेकिन इनका राजनीतिक अनुभव और क्षेत्र में पकड़ इन्हें दौड़ में बनाए हुए हैं।