नई दिल्ली:आठवीं शताब्दी के कश्मीर के सूर्यवंशी सम्राट ललितादित्य मुक्तापीड एक ऐसे महान और शूरवीर राजा थे. जिन्होंने  तिब्बत से लेकर द्वारिका तक, उड़ीसा के सागर तट से दक्षिण तक, पूर्व में बंगाल, पश्चिम में विदिशा और मध्य एशिया तक अपने राज्य का परचम फहराया था. उसकी सेना की धमक ईरान तक जा पहुंची थी. इस वीर राजा ने पीकिंग यानि वर्तमान चीन तक को जीत लिया था. लेकिन वामपंथी इतिहासकारों ने ऐसे महान राजाओं के इतिहास को जान बूझकर छिपा दिया. 

कश्मीर के सिकंदर कहे जाते हैं सम्राट ललितादित्य
विदेशी इतिहासकारों ने सूर्यवंशी सम्राट ललितादित्य मुक्तापीड को कश्मीर का सिकन्दर कहा है. कश्मीर की धरती के शूरवीरों ने कभी विदेशी आक्रमणकारियों और उनके शस्त्रों के सामने शीश नहीं झुकाया. कश्मीर का जिक्र महाभारत युद्ध में भी देखने को मिलता है. कश्मीर का ज्ञात इतिहास संस्कृत के राजतरंगिणी नामक महाग्रंथ में उपलब्ध है. राजतरंगिणी का एक श्लोक है.
विजीयते पुण्यबलैर्बर्यत्तु न शस्त्रिणम
परलोकात ततो भीतिर्यस्मिन् निवसतां परम्।।

इस श्लोक अर्थ है कि कश्मीर पर शस्त्रों से नहीं केवल पुण्य से विजय प्राप्त की जा सकती है. वहां के निवासी केवल परलोक से भयभीत होते हैं न कि शस्त्रधारियों से.

ईरान तक जीत हासिल की सम्राट ललितादित्य ने
राजतरंगिणी के अनुसार आठवीं शताब्दी के सबसे शक्तिशाली सूर्यवंशी सम्राट ललितादित्य ने भारत के कई राज्यों और मध्य एशिया तक फतह हासिल कर ली थी. सम्राट ललितादित्य कार्कोटक वंश के सबसे शक्तिशाली हिंदू शासक थे. ललितादित्य ने कश्मीर में परिहासपुर नगर बसाया था.  उन्होंने अपने पराक्रम और साहस से तिब्बतियों, कम्बोजों और तुर्को को रणक्षेत्र में पराजित किया था.

विद्वानों के संरक्षक थे ललितादित्य
सम्राट ललितादित्य की सर्वश्रेष्ठ उपलब्धि थी - कन्नौज नरेश यशोवर्मन पर जीत.  कन्नौज के राजा यशोवर्मन को हराने के बाद उसके दरबारी संस्कृत कवियों भवभूति और वाक्पतिराज को ललितादित्य ने कश्मीर बुलाकर अपने दरबार में स्थान दिया. 

लगभग पूरे उत्तरापथ के अधिपति थे ललितादित्य
सम्राट ललितादित्य ने अपने सैन्य अभियान से बंगाल, बिहार, उड़ीसा तक अपने साम्राज्य का विस्तार किया. उनकी सेनाओं का कूच गुजरात, मालवा और मेवाड़ तक सफलतापूर्वक आगे ही आगे बढ़ता गया.  ललितादित्य के इन सफल युद्ध अभियानों के कारण भारत ही नहीं समूचे विश्व में कश्मीर की धरती के पराक्रमी वीर सम्राट ललितादित्य का नाम यशस्वी हुआ.

चीन और दक्षिण एशिया को भी जीता
दक्षिण तक विजय प्राप्त करने के बाद सम्राट ललितादित्य उत्तर के ऊंचे शिखरों को नापने के बैचेन थे. कश्मीर उस समय सबसे शक्तिशाली राज्य बन चुका था. सम्राट ललितादित्य ने कश्मीर की उत्तरी सीमाओं पर स्थित क्षेत्रों की तरफ अपना विजयरथ दौड़ाना शुरु किया.  इस अभियान में भारत से चीन तक के कारवां मार्गों को नियंत्रित करने वाली काराकोरम पर्वत श्रृंखला के सबसे अगले स्थल तक उनका साम्राज्य फैला था.

मुस्लिम आक्रमण को ललितादित्य ने थाम लिया
 दरअसल आठवीं सदी के शुरू होते ही अरबों का आक्रमण काबुल घाटी को चुनौती दे रहा था. इसी दौरान सिंध के रास्ते से मुस्लिम शक्तियां उत्तर की ओर बढ़ने का प्रयास कर रही थी. जिस समय काबुल और गांधार का शाही साम्राज्य इन आक्रमणों में व्यस्त था, ललितादित्य के लिए उत्तर दिशा में पांव जमाने का एक सुंदर अवसर था. अपनी विजयी सेना के साथ ललितादित्य, तुर्किस्तान की ओर बढ़े.  ललितादित्य के मार्गदर्शन में कश्मीरी सेना ने मध्य एशियाई नगरों पर विजय प्राप्त कर ली.  ललितादित्य की सेना की पदचाप अरण्यक यानि आज के ईरान तक पहुंच गई थी. सम्राट ललितादित्य ने कश्मीर पर आक्रमण करने वाले अरब हमलावर मोमिन के विरोध चार युद्ध लड़े और चारों बार उसे हराया.

चीन पर भी हासिल की जीत
ललितादित्य ने चीन की राजधानी पीकिंग(वर्तमान बीजिंग) को भी जीता और 12 वर्ष के पश्चात् कश्मीर लौटे. 733 ई. में ललितादित्य ने चीन में अपना दूत मण्डल भेजा. विजेता होने के साथ ही राजा ललितादित्य एक महान् निर्माता भी था.  उनके शासनकाल में व्यापार, चित्रकला, मूर्तिकला के क्षेत्रों में विशेष प्रोत्साहन और सुविधाएं दी गयीं.  ललितादित्य एक सफल लेखक और वीणावादक भी थे. धार्मिक दृष्टि से उदार होने के कारण सम्राट ने कई बौद्ध मठों और हिन्दू मंदिरों का निर्माण करवाया.  उनके शासन काल में ही सूर्य का प्रसिद्ध मार्तण्ड मंदिर भी बना. जम्मू-कश्मीर के अनंतनाग जिले के खेराबल गांव में मार्तंड सूर्य मंदिर के खंडहर आज भी मौजूद हैं.

काफी लंबा रहा ललितादित्य का शासनकाल
ललितादित्य मुक्तापीड का शासनकाल 724 से 761 ईस्वी तक रहा.  उनका सैंतीस वर्ष का राज्य उसके सफल सैनिक अभियानों, उसके अद्भुत कला-कौशल-प्रेम और विश्व विजेता बनने की उनकी ख्वाहिश से पहचाना जाता है.