नई दिल्ली/कौशाम्बी:यूं तो अपने तरह-तरह की शादियां देखी होगी, लेकिन, कौशाम्बी के बाकरगंज गांव में एक 75 साल के वृद्ध की शादी इन दिनों खासी चर्चा का विषय बनी हुई है, वैसे तो ये शादी हिन्दू रीति-रिवाज के मुताबिक आम शादी की तरह ही थी, लेकिन, शादी तब चर्चा में आई जब दुल्हन की जगह वृद्ध ने फेरे कपास की लकड़ी के टुकड़े के साथ लिए, दुल्हन की शुक्ल में तैयार करके विवाह की सारी रस्में पूरी करवाई गईं, गांव में परंपरा के निर्वहन के लिए 75 साल के व्यक्ति ने बुढ़ापे में कपास की लकड़ी से शादी रचाई,

मुखाग्नि के लिए की शादी
कौशाम्बी के बाकरगंज गांव के 75 साल के दुर्गा प्रसाद ने सुना कि यदि किसी शख्स की शादी न हो और उसकी मौत हो जाती है तो उसे मुखाग्नि न दिए जाने की परंपरा है, मृत्यु के बाद पंचतत्व में विलीन होने के लिए उन्होंने ये शादी की, दुर्गा प्रसाद ने गांव के ही शंकर सिंह से इस सिलसिले में बात की, बात करके दोनों ने ये तरकीब निकली कि कपास की लकड़ी से शादी कर अविवाहित होने का दंश खत्म हो सकता है, शंकर सिंह, दुर्गा प्रसाद की मदद को तैयार हो गए, उन्होंने लड़की का पिता बनकर कन्यादान कर अपने दोस्त की इच्छा को पूरा किया,

लकड़ी के टुकड़े को दुल्हन की तरह सजाया
शादी की तैयारियां शुरू हुई, कपास की लकड़ी के टुकड़े को दुल्हन की तरह सजाया गया, शंकर सिंह के घर में खुशियों का माहौल बना, घर में महिलाओं ने मंगल गीत गाए, दुर्गाप्रसाद दूल्हे के रूप में सजधज कर नाचते-गाते बरातियों संग गांव के मैदान में बनवाए गए जनवासे में पहुंचे, नाचते गाते बाराती दुल्हन के घर पर पहुंची, पंडित भार्गव प्रसाद ने हिन्दू परंपरा के अनुसार के बाद दुल्हे का स्वागत कर वैवाहिक रस्म पूरी कराई, इस दौरान करीब 100 बरातियों के लिए भोजन की व्यवस्था भी की गई थी,

इसलिए लिया फैसला
पुरोहित भार्गव प्रसाद के मुताबिक, यदि किसी शख्स की शादी न हो और उसकी मौत हो जाती है, तो, उसे मुखाग्नि न दिए जाने की परंपरा है, वृद्ध दुर्गा प्रसाद ने भी घर की जिम्मेदारियों को पूरा करते करते उन्होंने शादी नहीं की, ऐसे में परिवार के लोगो ने उन्हें सलाह दी की कपास की लकड़ी की प्रतीकात्मक दुल्हन बना कर उससे विवाह के संस्कार पूरे करने पर उनके भी मृत शरीर को मुखाग्नि दी जा सकेगी, यही कारण है कि दुर्गा प्रसाद काफी बुजुर्ग होने के कारण हिन्दू परंपरा को देखते हुए उसने बुढ़ापे में शादी रचाने का मन बनाया, उसका मानना है कि कुंवारेपन में मौत होने पर उसे मुखाग्नि नहीं मिलेगी और वो पंच तत्व में विलीन नहीं हो पाएगा, इसे देखते हुए उन्होंने इस उम्र में शादी रचाने का फैसला कर लिया,