जम्मू-कश्मीर (Jammu-Kashmir) में एक फिर राजनीतिक हलचल तेज हो गई हैं. बीते दिनों पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती (Mehbooba Mufti) की रिहाई के बाद घाटी के राजनीतिक दलों ने केंद्र सरकार को घेरने के लिए पहली बार गठजोड़ किया है. नेशनल कॉन्फ्रेंस (National Conference) प्रमुख फारूक अब्दुल्ला ने एक बैठक बुलाई. बैठक में पीडीपी (PDP) और नेशनल कॉन्फ्रेंस समेत कई राजनीतिक दलों ने 'गुपकर समझौते' पर चर्चा की. बैठक के बाद पीपुल्स अलायंस (People Alliance) नामक गठबंधन का घोषणा की. सवाल यह है कि घाटी के नेताओं के पास मोदी सरकार को घेरने के विकल्प क्या हैं..?

क्या है 'गुपकर समझौता'
घाटी के मुख्य राजनीतिक दल नेशनल कांफ्रेंस और पीपुल डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) समेत अन्य राजनीतिक दलों ने गुपकर समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं. इस समझौते का उद्देश्य घाटी के लोगों के अधिकार की मांग, राजनीतिक कैदियों को रिहा करवाना और जम्मू-कश्मीर के विशेष दर्जे (अनुच्छेद 370) को बनाए रखना है. नेशनल कांफ्रेंस प्रमुख फारूक अब्दुल्ला ने यह बैठक अपने घर पर बुलाई थी. बैठक में पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती, उमर अबदुल्ला, सज्जाद लोन समेत कई अन्य नेता शामिल हुए थे. गौरतलब है कि घाटी में अनुच्छेद 370 के निष्प्रभावी होने और नेताओं की रिहाई के बाद यह पहली बड़ी बैठक है, जिसमें राजनीतिक हालात पर मंथन किया गया. सभी नेताओं ने अनुच्छेद 370 हटाने को गलत माना और इस वापस लागू करने की मांग कर रहे हैं.
घाटी के नेताओं के पास सीमित विकल्प


कश्मीर के शीर्ष नेताओं ने केंद्र सरकार पर चढ़ाई करने के लिए एक राजनीतिक फौज तो तैयार कर ली है, लेकिन पहले वे भविष्य में होने वाली बैठकों में इसके संयोजन के आकार, संरचना और एजेंडे पर काम करेगी. तब तक पार्टियां अपने अधिकारों को वापस पाने के लिए एक संवैधानिक और कानूनी लड़ाई का राजनीतिक दांव चलेंगी.

सरकारी अधिकारियों से बात करेगा गठबंधन
कश्मीर घाटी के नेताओं के मुताबिक, इसके लिए उन्हें शीर्ष सरकारी अधिकारियों के साथ बातचीत करने से भी कोई परहेज नहीं है. यह ठीक वैसा ही है जैसे लद्दाख के प्रतिनिधियों ने केंद्रशासित प्रदेश में संविधान की छठी अनुसूची के विस्तार के मुद्दे पर किया था. केंद्र भी लद्दाख पर नजर बनाए हुए है. बता दें कि लद्दाख में काउंसिल चुनाव के बहिष्कार के बाद बीजेपी ने अपने दो नेताओं को लेह भेजा था.

पीपुल्स अलायंस पर अधिक बल
वहीं गृहमंत्री अमित शाह ने भी इन प्रतिनिधियों को विश्वास में लेने के लिए दिल्ली में एक बैठक बुलाई थी. अब कश्मीरी नेता भी ऐसा कुछ सोच रहे हैं, लेकिन वह इस बात को लेकर आश्वस्त नहीं हैं, क्योंकि राज्य में होने वाले चुनाव में कुछ महीनों का ही समय बचा है. घाटी के नेता फिलहाल पीपुल्स अलायंस की भूमिकाओं और इसकी संरचना को मजबूत करने में समय बिताएंगे और बाद में लद्दाख में नेतृत्व करने की सोचेंगे.

राजनीतिक गतिविधियों की समीक्षा
13 अक्टूबर को महबूबा मुफ्ती की रिहाई के बाद से ही कश्मीर में राजनीतिक गतिविधियों में अचानक तेजी आई है. वहीं, जनता में कई सालों से घाटी के नेताओं के प्रति विश्वास में कमी बढ़ती जा रही है. महबूबा मुफ्ती और सज्जाद लोन को बीजेपी से गठजोड़ करना भारी पड़ा है. इसके लिए घाटी के नेताओं ने अब केंद्र सरकार से भविष्य में किसी भी गठबंधन पर संभावना पर साफ इनकार किया है.

केंद्र के लिए चिंता का सबब कश्मीरी दलों की एकता
कश्मीर के राजनीतिक दलों की एकता भाजपा सरकार के लिए थोड़े समय के लिए चिंता का विषय हो सकती है. केंद्र सरकार अगले साल कश्मीर में चुनाव कराने की तरफ देख रही है, ऐसे में बीजेपी अपने राजनीतिक एजेंडे में ऐसा कोई काम नहीं करेगी, जिससे जनता के बीच उसकी साख पर सवाल उठने लगे. क्योंकि बीजेपी को पहले ही स्थानीय पार्टियों की आलोचना का सामना करना पड़ा है.

फारूक अब्दूल्ला का चीनी सत्ता का राग
पीपुल्स अलायंस के संभावित प्रमुख फारूक अब्दुल्ला ने एक इंटरव्यू में राज्य से अनुच्छेद 370 हटाने को लेकर यह कहकर तूफान मचा दिया था कि चीनी सरकार बीजेपी के इस कथित अत्याचारी शासन से उन्हें निजात दिलाने में मदद करेगी. राजनीतिक विरोध के चलते उन्हें अपना यह बयान वापस लेना पड़ा. देश में भले ही इस पर बयान पर राजनीति तेज हो गई थी, लेकिन जम्मू-कश्मीर के प्रति चीन की बढ़ती रुचि कोई छुपी बात नहीं.