कहते हैं, विरासत में मिले रिश्ते निभाने पड़ते हैं लेकिन दोस्ती का रिश्ता निभाया जाता है। दुनिया के चुनिंदा सबसे कीमती रिश्तों में है दोस्ती का रिश्ता। इसी रिश्ते को सेलिब्रेट करने का मौका है 5 अगस्त यानी इंटरनेशनल फ्रेंडशिप डे।  हर साल अगस्त माह के पहले रविवार को ये दिन दुनियाभर में मनाया जाता है। इस दिन का इतिहास भी दोस्ती के किस्से से जुड़ा हुआ है। जानें, इस दिन के बारे में कुछ दिलचस्प बातें।

इस दिन की शुरुआत के बारे में वैसे तो ढेरों किस्से प्रचलित हैं लेकिन माना जाता है कि अमेरिका में साल 1935 में सबसे पहली बार फ्रेंडशिप डे मनाया गया। हुआ यूं कि उसी साल अगस्त के पहले रविवार को सरकार ने किन्हीं कारणोंवश एक व्यक्ति को मार दिया था। गम में उस व्यक्ति के दोस्त ने खुदकुशी कर ली। उसी दिन से खुद अमेरिकी सरकार ने इस दिन को दोस्ती के नाम कर दिया। बाद में यूनाइटेड नेशन्स ने भी इसे इंटरनेशनल फ्रेंडशिप डे घोषित कर दिया, जिसके बाद से तमाम दुनिया इसे मनाने लगी।

क्या बनाता है इसे खास
हर खास दिन किसी वजह से खास होता है और इसके साथ कुछ प्रतीक भी जुड़े होते हैं। ऐसा ही फ्रेंडशिप डे के भी साथ है। दोस्ती का ये पर्व अल्फाज और फूलों के इर्द-गिर्द बंधा हुआ है। हॉलमार्क कार्ड के फाउंडर जोस हॉल ने सबसे पहले इस पर्व को ग्रीटिंग कार्ड से जोड़ा था। तब से इस रोज कार्ड देने-लेने का चलन बना। सालभर अपनी भावनाओं को कभी व्यस्तता तो कभी शब्दों की कमी की आड़ में छिपाने वाले लोग इस दिन खुलकर खुद को व्यक्त करते हैं।

वक्त के साथ फ्रेंडशिप डे का रंग-रूप और तौर-तरीके बदले। बाजार आजकल फ्रेंडशिप बैंड्स से अटा पड़ा है, जिसमें तरह-तरह के संदेश लिखे होते हैं। ये एक-दूसरे को लिया-दिया जाता है। पीले गुलाब भी दोस्ती का प्रतीक माने जाते हैं और इस दिन इनकी भी बड़ी मांग रहती है। सोशल मीडिया की पैठ बनने के बाद से मित्रता दिवस पर ई-संदेश भी भेजे जाने लगे।

हमारे यहां भी दोस्ती पर कई कहानियां-कविताएं लिखी गईं। यहां तक कि बड़े परदे पर भी इसका जिक्र होता रहा है। कई फिल्मों ने शाहकार रचा। याराना, दिल चाहता है और शोले जैसे फिल्में इन्हीं में से हैं। इंटरनेशनल म्यूजिक इंडस्ट्री में बीटल्स बैंड ने इसी रोज एक गाना रिलीज़ किया था- With Little Help From My Friends....जो आज भी दुनियाभर में सुना-सुनाया जाता है।

मित्रता दिवस से जुड़ने के कुछ और कारण भी अब आपके पास हैं। तो फिर देर किस बात की, मजहब, उम्र, लिंग और सीमाओं से परे इस दिन को आप भी खुलकर मनाएं।