जयपुर। अपनी जाति में दबदबा रखने वाले तीन दिग्गज नेताओं को लेकर भाजपा को भरपूर उम्मीद है। भाजपा ने अभी तक इन तीनों ही दिग्गजों को लेकर कोई चुनावी प्लान नहीं बनाया है, लेकिन इन तीनों नेताओं के भरोसे भाजपा अपने आप की जीत की गारंटी मानकर चल रही है। हालांकि तीनों ही नेताओं के डीएनए में भाजपा है। आखिर क्या रहेगी मार्शल कौम की गणित, पेश है एक रिपोर्ट:

कभी अपने आप को जातिवाद से दूर और पार्टी विद डिफरेन्स कहने वाली भाजपा में अब तीन मार्शल जातियों को साधने के लिए तीन ब्रह्मास्त्र रूपी तीर तरकश में है। जिन्हें लोकसभा में चलाया जाना है। किरोड़ीलाल मीणा, किरोड़ी सिंह बैंसला और हनुमान बेनीवाल। यानी मीणा, गुर्जर और जाट। तीनों जातियों का राजस्थान में अच्छा खासा दबदबा है। भाजपा मानकर चलती है कि ब्राह्मण, वैश्य और राजपूत तो उनके साथ हैं, लेकिन मोदी के विजय अभियान को दोबारा जारी रखने के लिए इन तीनों जातियों को साधना जरूरी है। एक समय था तब कभी ये तीनों ही नेताओं ने भाजपा को अपने जातिगत वोटों के बूते परेशान करके रख दिया।  

किरोड़ीलाल मीणा:

भले ही डीएनए में इनके भाजपा ही हो, लेकिन यहां जातियों की गणित को समझना होगा। सबसे पहले बात करतें है संघनिष्ठ किरोड़ीलाल मीणा की। हालांकि किरोड़ीलाल मीणा को वापस मूल पार्टी भाजपा में प्रवेश किये हुए 1 साल से ज्यादा का वक्त हो चुका है, लेकिन किरोड़ीलाल मीणा के भाजपा में वापस जाने से पूर्व भाजपा इस बात को लेकर प्रसन्न थी कि किरोड़ीलाल मीना भले ही उनके प्रतिद्वंद्वी है, लेकिन एन्टी मीणा वोट ऐसे में उनकी पॉवर बनेगा। हालांकि 2013 के चुनाव में ऐसा हुआ भी। राजनीति में किसी की कोई स्थायी गारंटी नहीं होती। 2018 के विधानसभा चुनाव से पहले किरोड़ीलाल मीणा भाजपा में आये इस उम्मीद पर की शायद इस बार सचिन पायलट के गुर्जर वार का जवाब किरोड़ी का मीणा पलटवार होगा। लेकिन पूर्वी राजस्थान में किरोड़ीलाल कमाल नहीं दिखा सके। हालांकि अब भाजपा का मानना है कि मीणा समाज किरोड़ीलाल मीणा का इस बार साथ देगा। कारण साफ की मीणा समाज विधानसभा चुनावों में भाजपा के किरोड़ी लाल कैम्प को मिली शिकस्त से अब उनके अस्तित्व को लेकर एकजुट हो चुका है।

दौसा सवाईमाधोपुर करौली धौलपुर टोंक कोटा अलवर जयपुर समेत कई ऐसे इलाके है जहां पर किरोड़ीलाल मीणा के बूते भाजपा मीणा समाज के वोट बैंक पर अपना अधिकार मानकर चल रही हैं, लेकिन यदि दौसा सीट पर उनकी राजनैतिक गणित फिट बैठ जाती है तो तय मानकर चलिये कि किरोड़ीलाल मीणा जबरदस्त एक्शन में होंगे। कारण साफ की उन्हें मोदी की उम्मीद पर खरा उतरना होगा। अभी चुनावी संग्राम शुरू हो चुका है, लेकिन किरोड़ीलाल मीणा की सभाओं का भाजपा की ओर से कोई प्लान ही तैयार नही हुआ है। न ही किरोड़ीलाल मीणा अपने चिरपरिचित अंदाज़ में चुनावी मैदान में है।

हनुमान बेनीवाल:

अब दूसरी मार्शल जाति के दिग्गज हनुमान बेनीवाल की बात करें तो जाट समाज की युवा सेना उनकी ताकत है। कभी भाजपा कांग्रेस दोनों ही पार्टियों की अपने बयानो से बखिया उधेड़ने वाले हनुमान पिछले 2 विधानसभा चुनाव में भले ही भाजपा के खिलाफ बगावत कर रहे थे, लेकिन नागौर समेत राज्य की जाट लैंड भूमि की स्थितियों को भांपकर, अपने अस्तित्व के लिए नागौर में मिर्धा परिवार की ज्योति मिर्धा के खिलाफ मैदान में है। जानकारों की मानें तो हनुमान को लेकर भाजपा को भरोसा है कि हनुमान उनके लिए बाड़मेर, नागौर, बीकानेर, सीकर, झुंझुनूं समेत जाट बाहुल्य इलाको में संकटमोचक बनेंगे।

आरएलपी अब भाजपा के साथ है। हनुमान भी अपने सुर बदलकर कहने लगे हैं कि युवा चाहता हैं कि राष्ट्र के लिए मोदी को पीएम बनना जरूरी है। यही कारण है कि उन्होंने अपने समाज के युवाओं की सुनी और भाजपा के साथ हाथ मिलाकर उन्हें समर्थन दिया, लेकिन फिलहाल अपनी नागौर सीट पर पूरा फोकस करने वाले हनुमान बेनीवाल की अन्य संसदीय सीटों को लेकर भाजपा के प्रचार और चुनावी सभाओं का सभी को इंतज़ार है। भाजपा ने अभी तक उनका भी कोई प्लान नही बनाया है कि आखिर हनुमान कहां कहां चुनावी सभाएं करेंगे या फिर नागौर में ही रहकर ज्योति की चुनोती में दो दो हाथ करेंगे।

कर्नल किरोड़ी सिंह बैंसला:

कल ही फिर से भाजपा का दामन थामने वाले कर्नल किरोड़ी सिंह बैंसला अपने पुत्र के साथ भाजपा में आ तो गए, लेकिन जानकारों की मानें तो समझ से परे है कि जब 24 टिकट घोषित हो गये तो आखिर कर्नल की एंट्री किस आधार पर हुई होगी। हालांकि कर्नल भाजपा में वापस जाने को राष्ट्र प्रेम और सेना के मान सम्मान बढ़ने से जोड़ते है। हालांकि कांग्रेस को अब ये कहने का मुद्दा मिल गया कि कर्नल का गुर्जर आंदोलन राजनैतिक आंदोलन था, लेकिन बड़ा सवाल ये कि कल तक सिर्फ गुर्जर समाज की राजनीति करने वाले कर्नल भले ही कभी टोक सवाईमाधोपुर का लोस चुनाव हार गए हो, लेकिन फिर से भाजपा का दामन थामने के बाद क्या विधानसभा चुनाव में छिटके गुर्जरो को वापस भाजपा के साथ जोड़ पाएंगे या नहीं?

हालांकि गुर्जर समाज कमोबेश राज्य के हर हिस्से में अच्छी संख्या में है, लेकिन पूर्वी राजस्थान और हाड़ौती को लेकर कर्नल के जरिए गुर्जरों को जोड़ने की भारी उम्मीदें हैं। भाजपा ने उन्हें लेकर भी अभी तक ऐसा कोई प्लान नही बनाया, जिसके तहत उन्हें मिशन गुर्जर में झोंका जा सके। इंतज़ार है कि आखिर कर्नल को भाजपा कौन कौन से हिस्सों का टास्क देगी।

अब इन तीनो मार्शल जातियों के दिग्गजों से भाजपा उम्मीद लगाकर बैठी है कि राज्य में इन तीनों के तीर तरकश से निकालकर कांग्रेस से विधानसभा चुनाव का बदला लिया जाएगा। देखने वाली बात ये होगी कि कांग्रेस अब भाजपा के मूल वोट बैंक में सेंध लगाने के साथ इन तीनो मार्शल जातियों पर अपना कौनसा आग्नेयास्त्र चलाती है।