नई दिल्लीःएक समय होता था कि जब मौसम के असर से धूप गुनगुनी से कुछ अधिक गर्म मालूम होती थी और इस समय तक हौदे में पानी का खौलाना बंद कर दिया जाता था. सुबह 11 बजे के बाद या तो पूरा परिवार छत पर चढ़ चुका होता था या फिर आंगन में चटाई बिछा कर हंसी-ठिठोली के दौर से गुजर रहा होता था.

जहां तक नजर जाती थी, सारी दुनिया ऐसी पीली-नारंगी और कभी गुलाबी सी दिखती थी कि बस जैसे किसी कोई नवजात एक-दो रोज पहले ही दुनिया में आया हो और उसके हिस्से सिर्फ दो काम हों, एक तो जी भर कर सुस्ताना और जब जागना तो हाथ-पांव फेंकते हुए मस्ती करना.

यह वह समय होता था कि जब ऋतुराज वसंत अपने पूरे चरम पर हुआ करते थे और एक या दो हफ्ते बाद आने वाली होली का जोर-शोर से इंतजार होता था. 

मैदे में खोआ, जैसे जिंदगी में मिठास
हालांकि ऋतुराज वसंत आज भी आते हैं और हर साल की तरह इस बार भी अपने संग होली की सौगात ले आए हैं, लेकिन जिस मस्ती और उल्लास का नजारा ऊपर लिखा हुआ है उसे महसूस करने आपको महानगरों की तंग गलियों से निकलकर गांव-कस्बों के खुले माहौल में जाना होगा.

जहां आपकी मां या घर की कोई बड़ी-बूढ़ी पीली-काली सरसों पीस रही है, ताकि उबटन बना सके. या फिर पूरा परिवार इकट्ठा बैठकर मैदे की पूड़ियों में खोआ भरकर पोटलियां बना रहा है. जैसे कि जिंदगी भर की मिठास इन छोटी-छोटी पोटलियों में भर लेना चाहता है. 

...लेकिन क्या बस इतनी ही सी है होली
गुजिया, नमकीन, तरह-तरह के पकवान, उबटन और गुलाल होली के दिखाई देने वाले रंग हैं. अंतर्मन की ओर झांके तो जीवन के लिए रंगदूत का यह बड़ा संदेश है. होली मर्यादाओं के साथ सारी वर्जनाएं तोड़ देने त्योहार है. यह परंपरा जितनी सामाजिक है, उससे कहीं अधिक वैज्ञानिक है और सबसे उच्च और मूल स्वरूप में आध्यात्मिक है.

सामाजिक तौर पर यह केवल एक त्योहार है जिसे रंग खेलकर उल्लास दिखाते हैं. उल्लास की यह मानसिक अवस्था सारे भेद मिटा देती है. लाल-पीले-हरे रंगों में रंगे चेहरे अपना निजी और अस्तित्व भूल जाते हैं और स्रष्टा की सृष्टि में केवल एक ईकाई बने नजर आते हैं, लेकिन सवाल है कि क्या होली का इतना ही अर्थ है?

एक वैज्ञानिक संकेत भी है होली
वैज्ञानिक पक्ष देखें तो यह मामला इससे एक कदम आगे का है. इसलिए पहले पर्व शब्द का विश्लेषण करते हैं. हिंदी भाषा का इस शब्द का अर्थ होता है जोड़ना, मध्य का उठा हुआ भाग और संधियां यानि की जुड़ाव. होली का पर्व दो भिन्नताओं या अलगाव के बीच की संधि है, जुड़ाव है. यानि यह शरद से ग्रीष्म की ओर बढ़ने की यात्रा का संदेश है.

ऋतु परिवर्तन का काल है. फाल्गुन मास की पू्र्णिमा को मनाया जाने वाला यह पर्व इसलिए भी क्योंकि चंद्रमा की दो अलग अवस्थाओं के बीच मध्यस्थता का दिन है. यह वैज्ञानिक तौर पर संकेत है कि बिल से, अपनी खोह से निकलने का समय आया है. रजाई से निकलने का समय आया है. अब हमें ऋतु परिवर्तन की तैयारी करनी है. गर्मी की ऋतु के लिए आगे बढ़ना है. 

एक आवाजः ऋतु बदलने वाली है

प्रसिद्ध वेब सिरीज गेम ऑफ थ्रोन्स देखी होगी. उसका एक मशहूर मोनोलॉग है, विंटर इज कमिंग. हालांकि इसका उस कहानी में अलग मतलब है. एक तर्क यह है गर्मी आने से पहले ही हम इसके लिए मानसिक रूप से तैयार होते हैं कि अब खुद को अधिक शीतल रखने की जरूरत है. इसलिए हम रंगों में एक-दूसरे को भिगोते हैं. यानी पानी डालकर वातावरण को शीतल कर लेते हैं.

इसके ठीक उलट दीपावली उस मानसिक तैयारी का पर्व है, जो बताता है कि अब हमें जीवन के लिए तपिश की जरूरत है. इसलिए हम दीपक जलाकर वातावरण को गर्म कर लेते हैं. दीपावली भी चंद्रमा की दो अवस्थाओं के बीच आने वाली तिथि अमावस्या का पर्व है. यह संकेत है कि आगे आने वाले दिन अंधकार भरे भी हो सकते हैं, लेकिन हमें प्रकाशमान रहना है. यही जीवन जीने की शर्त है, गति है और चेतना है. 

राधा-श्याम, एक-दूजे में रंगे दो रंग
वैसे तो सभी त्योहारों का आध्यात्म का पक्ष बहुत ही सूक्ष्मता के साथ बेहद विस्तृत है. लेकिन होली के पर्व की व्याख्या कर पाना और भी अधिक कठिन है. इतना कि शोध करते जाइए और गहरे उतरते जाइए. फिर भी होली के रंग दो दिव्य धाराओं से होकर बिखरते हैं. एक तो परब्रह्म के मानवी स्वरूप में.

लोक में होली का यह रूप राधा-कृष्ण का है. एक-दूसरे में रंगा हुआ. जहां राधा खुद रंग हैं और श्याम उसमें रंगा चेहरा. जहां पर्वत के पत्थर भी श्याम हैं और यमुना के धारा से लेकर ओस की बूंद तक राधा हैं. 

ज्ञान की राह में जाति या कर्म नहीं हैं बाधा

क्या कहती है महादेव की नटराज मुद्रा
दूसरी धारा खुद देवाधिदेव महादेव की कृपा से निकली है. वह श्मशान में बैठे हैं और मुस्कुरा रहे हैं. शांत चित्त होकर. त्रिशूल और वासुकि को उन्होंने अलग रख दिया है साथ ही गंगा की बहती अविरल धारा को फिर से जटाजूट में बांध लिया है. अब वह त्रिभंगी मुद्रा में हैं. भोला नाथ हाथ उठाते हैं और धरती के समानांतर लाकर रोक लेते हैं.

फिर धीरे-धीरे हाथों को हृदय की ओर लाते हैं. बाएं पैर को दाहिने जांघ पर टिकाते हैं. यह मुद्रा आत्माओं के जागरण की है. शिव संसार की सभी आत्माओं की ज्योति हैं. वही ज्योति स्वरूप हैं. उनकी यह नटराज मुद्रा आदेश देती है कि यह जागृति का काल है. खुद को बदलाव के लिए तैयार करने का समय है. जागृति... यह शब्द सुनकर आत्मा उल्लास से भर जाती है. 

ब्रह्म है रंगरेज, बस रंग जाइए
अब अपना उल्लास वह कैसे मनाए? इसका गान कैसे करे. तब शिव सामने जल रही चिता से राख उठाते हैं और हवा में उछाल देते हैं. भूत भगवान राख में लिपटे हैं और अब हर गण-प्रेत सभी उसी राख में रंगकर अवधूत बन गए हैं. यही तो होली है. जहां भक्त भी भगवान है और भगवान भी उन्हीं के जैसा है. उनके साथ उनके बीच.

यह वसंत का समय है और आत्माएं चेतना का आनंद ले रही हैं. वह देखिए, संसार में आत्माएं होली खेल रही हैं. तो आप क्यों रुके हैं, डूब जाइए, उसके रंग में जो संसार का रंगरेज है. बस एक ही गान के साथ, डूबना है तेरे रंग में, नहीं रहना दूजा बनके.. ओ रंगरेज.