नई दिल्ली गुरुवार 13 सितंबर से गणेश चतुर्थी का त्योहार पूरे देश में धूमधाम के साथ शुरू हो गया है. दस दिनों तक चलने वाले इस महोत्सव में लोग घरों में बप्पा की स्थापना अपनी यथाशक्ति के हिसाब से करते हैं। भाद्रपद मास की शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को श्री गणेश चतुर्थी के नाम से मनाया जाता है।आज गुरुवार को चतुर्थी के दिन गुरु स्वाति संयोग भी लग रहा है।ऐसा संयोग लगभग 101 साल बाद बन रहा है।

पूजा का शुभ मुहूर्त
भगवान गणेश का लेकिन चतुर्थी के दिन मध्याह्न 12 बजे का समय गणेश-पूजा के लिए सर्वश्रेष्ठ माना गया है।मध्याह्न पूजा का समय गणेश-चतुर्थी पूजा मुहूर्त के नाम से ही जाना जाता है।इसीलिए पूजा का शुभ मुहूर्त दोपहर 12 बजे से रात 12 बजे तक होता है।ज्योतिषाचार्यों के मुताबिक 13 सितंबर को गणेश पूजा का समय सुबह 11.30 बजे से 13.30 बजे तक का है. वहीं, चंद्रमा को न देखने का समय सुबह 9.31 से रात 21.12 तक का है।

कैसे करें पूजा
चतुर्थी के दिन प्रातः काल उठकर सोने, चांदी, तांबे और मिट्टी के गणेश जी की प्रतिमा स्थापित कर षोडशोपचार विधि से उनका पूजन करते हैं. पूजन के बाद चंद्रमा को अर्घ्य देकर ब्राह्मणों को दक्षिणा देते हैं. मान्यता के अनुसार इन दिन चंद्रमा की तरफ नहीं देखना चाहिए। इस पूजा में गणपति को 21 लड्डुओं का भोग लगाने का विधान है।
महाराष्ट्र में जहां गणपति आगमन को बड़े धूमधाम से मनाया जाता है तो वहीं उत्तर भारत में गणेश चतुर्थी की रात के चांद को कलंक का चांद मानते हैं। इस दिन चांद देखने की मनाही होती है. ऐसा माना जाता है कि गणेश चतुर्थी का चांद देखने से श्राप मिलता है। चतुर्थी के दिन चंद्रमा ने गजानन का मजाक बनाया था जिसके बाद गणपति ने क्रोध में भरकर चंद्रमा को श्राप दे दिया कि जो व्यक्ति चतुर्थी के चांद के दर्शन करेगा।वह अपयश का भागी होगा. तब से ये प्रथा चली आ रही है कि चतुर्थी का चांद कलंक लाता है।