दिल्ली के चुनाव परिणामों से एक बात तो साफ है भारतीय जनता पार्टी चूक गई है. बीजेपी ने चुनाव में पूरी ताकत लगाई. इस चुनाव में बीजेपी ने कई राज्यों के मंत्रियों, 200 से ज्यादा सांसदों और केंद्रीय मंत्रियों की पूरी फौज उतार दी. यहां तक कि पार्टी अध्यक्ष जेपी नड्डा, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी कई चुनावी सभाएं कीं, लेकिन दिल्ली की जनता ने बीजपी को सत्ता देने की बजाय केजरीवाल को ही अपना नेता चुना.

1. जनता की नब्ज नहीं पहचान पाई बीजेपी: बीजेपी दिल्ली विधानसभा चुनाव में जनता की नब्ज नहीं पहचान पाई, पार्टी ने उन मुद्दों पर प्रचार नहीं किया जिन पर दिल्ली की जनता मतदान करने वाली थी.

2. केजरीवाल के मुकाबले कोई चेहरा नहीं: बीजेपी केजरीवाल के मुकाबले कोई चेहरा नहीं दे पाई. शायद 2015 के विधानसभा चुनावों में किरण बेदी की करारी हार के बाद बीजेपी प्रधानमंत्री मोदी के चेहरे पर चुनाव लड़ना चाहती थी, लेकिन केजरीवाल ने मोदी से ये सवाल पूछा कि क्या वे दिल्ली के सीएम बनेंगे? बीजेपी के प्रधानमंत्री मोदी के चेहरे पर चुनाव लड़ने की योजना की हवा निकाल दी.

3. स्थानीय मुद्दों की अनदेखी: देश की सत्ता हाथ में होने के कारण बीजेपी के केन्द्रीय नेतृत्व के नेता राष्ट्रीय मुद्दों पर बात करते दिखे. ऐसे में स्थानीय नेताओं की जिम्मेदारी बनती थी कि वे स्थानीय मुद्दों के साथ जनता में जाएं, लेकिन बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष मनोज तिवारी समेत स्थानीय नेता भी सिर्फ राष्ट्रीय मुद्दों पर ही बात करते दिखे.

4. अमित शाह की योजना की अनदेखी: तत्कालीन पार्टी अध्यक्ष और वर्तमान गृह मंत्री अमित शाह के बार-बार कहने के बाद भी बीजेपी के सातों सांसद और स्थानीय नेता आम आदमी पार्टी सरकार की फ्लैगशिप स्कीमों में कोई कमी नहीं निकाल पाए.
5. चुनाव के बीच कानून व्यस्था का बिगड़ना: शाहीनबाग, जेएनयू, जामिया जैसे मुद्दे ठीक चुनाव के बीच ही उठे. ऐसे में इन मुद्दों पर आम आदमी पार्टी सरकार को घेरने का बीजेपी का दांव उल्टा पड़ गया, क्योंकि दिल्ली की जनता ये समझ रही थी कि दिल्ली में कानून- व्‍यवस्‍था ठीक करने की जिम्मेदारी केन्द्र सरकार के पास है जबकि बीजेपी नेता बार-बार इसके लिए केजरीवाल को जिम्मेदार बताते रहे.

6. फ्री योजनाओं के बंद होने का डर: आम आदमी पार्टी की फ्री बिजली, फ्री पानी, मोहल्ला क्लीनिक जैसी योजनाओं के मुकाबले बीजेपी कोई योजना सामने लेकर नहीं आई. उल्टे इन योजनाओं की आलोचना कर बीजेपी ने दिल्ली की जनता में ये डर बैठा दिया कि अगर बीजेपी सरकार आती है तो फ्री बिजली-पानी बंद हो जाएगा.7. उम्मीदवारों का चयन: भारतीय जनता पार्टी ने उम्मीदवारों के चयन में जरूरत से ज्यादा देरी की. यहां तक कि स्थानीय नेताओं का आरोप है कि पार्टी ने दिल्ली में एक तिहाई सीटों पर बाहरी नेताओं को उम्मीदवार बना दिया.

8. ज्यादा आक्रामक चुनाव प्रचार: दिल्ली के चुनाव प्रचार पर नजर डालें, तो बीजेपी जहां आक्रामक चुनाव प्रचार कर रही थी, वहीं आम आदनमी पार्टी जमीनी स्तर पर प्रचार में लगी थी. बीजेपी नेताओं की आक्रामक भाषाशैली के कारण पार्टी को कई बार बैकफुट पर जाना पड़ा.

 

9. कमजोर बूथ मैनेजमेंट: बीजेपी के प्रचार को देखें, तो स्थानीय नेता और उम्मीदवार स्थानीय स्तर पर जनसम्पर्क करने की बजाय रैलियों पर ज्यादा ध्यान देते रहे और अपनी जनता के बीच उतना समय नहीं दे पाए जिसकी स्थानीय जनता उनसे उम्मीद कर रही थी.

10. स्थानीय नेताओं की अनदेखी: बीजेपी के चुनाव प्रचार को देखें, तो पार्टी में स्थानीय नेताओं से ज्यादा बाहरी नेता इकठ्ठा हो गए. बाहरी नेताओं और मंत्रियों, सांसदों की संख्या इतनी ज्यादा रही कि कई बार स्थानीय नेता अपने आपको उपेक्षित महसूस करने लगे.