नई दिल्ली, भारतीय रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन का मानना है कि कई बार अंदर से उन्हें लगता है कि उनके कार्यकाल के दौरान कुछेक अवसरों पर तरलता या नकदी की स्थिति का बेहतर तरीके से प्रबंधन किया जा सकता था। हालांकि, इसके साथ ही पूर्व गवर्नर ने कहा कि जब आंकड़ों से तरलता की कमी का पता चलता था, केंद्रीय बैंक इसे सुधारने के लिए तत्काल कदम उठाता था।

उन्होंने कहा कि एक स्थान पर हम यह पता नहीं लगा पाए कि प्रणाली में नकदी का संकट हो रहा है। आंकड़े देखने के बाद हमने तत्काल स्थिति को तटस्थ करने के लिए कदम उठाया, लेकिन यह एक ऐसी चीज थी, जिसका पता हमें पहले ही लग जाना चाहिए था। उनसे पूछा गया था कि क्या अपने तीन साल के कार्यकाल में कभी उन्हें अपने भीतर से ऐसा लगा कि वह कुछ अलग करना चाहते थे।

राजन ने कहा कि वह चाहेंगे कि उन्हें तरलता की स्थिति को सुधारने के लिए कुछ माह पहले ही कदम उठाना चाहिए थे। उन्होंने कहा कि हम नकदी की कमी वाली प्रणाली में परिचालन कर रहे थे। रिजर्व बैंक को हमेशा ऐसा करना पड़ता है। हमने इसके बारे में पता तो लगाया, लेकिन यह कुछ माह पहले पता लगना चाहिए था। ऐसे में मैं चाहता था कि मुझे बाद में दिखा वह एक-दो महीने पहले दिख जाना चाहिए था।

वित्त वर्ष 2015-16 की दूसरी छमाही में बैंकिंग प्रणाली में नकदी की कमी हो गई थी और इसे अप्रैल, 2016 की मौद्रिक समीक्षा में ही दूर किया गया। इसकी वजह से बैंक मौद्रिक नीति में ब्याज दरों में कमी का लाभ ग्राहकों को नहीं दे रहे थे। एक समय भाजपा सांसद सुब्रमण्यन स्वामी ने राजन पर आरोप लगाया था कि वह मन से पूरी तरह भारतीय नहीं हैं और उनकी मुद्रास्फीति केंद्रित नीति से वृद्धि प्रभावित हो रही है।