नई दिल्ली: जस्टिस रंजन गोगोई सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस बन गए। उनके सामने बड़ी चुनौती है न्यायपालिका को मिलने वाला पैसा। फिलहाल देश अपने बजट का केवल 0.8% न्यायपालिका पर खर्च करता है। ज्यूडिशियरी के बजट और खर्च पर एक रिपोर्ट...

बजट
बजट में ई-कोर्ट मिशन को 480 करोड़ रुपए दिए गए। इससे 709 नए कोर्ट को कम्प्यूटराइज्ड करने और छह हजार कोर्ट को तकनीकी बुनियादी ढांचा मुहैया कराने का काम होना है। इसके अलावा 41 कोर्ट कॉम्प्लेक्स में वाई-फाई और सोलर एनर्जी यूनिट तैयार करना भी इसी प्रोजेक्ट का हिस्सा है। इस बार 21.47 लाख करोड़ रुपए के बजट में से 1744.13 करोड़ रुपए न्याय व्यवस्था चलाने के लिए दिए गए। इसमें से 251.06 करोड़ रुपए सुप्रीम कोर्ट पर खर्च हुए, जो कि बजट का 0.012% और न्यायापालिका को मिले पैसे का 14% हुआ।

खर्च
भारत हर साल 12 हजार करोड़ रुपए न्यायपालिका पर खर्च करता है। जो हमारी जीडीपी का 0.01% है। भारत अपने बजट का 0.8% ज्यूडिशियरी पर खर्च करता है। वहीं, अमेरिका 1%। भारत के राज्य औसतन 1600 से 2700 रुपए प्रति केस प्रति वर्ष खर्च करते हैं। राज्य के बजट का अंदाजा लगाएं तो महाराष्ट्र ने सालभर में कुल खर्च का 2.8% न्यायपालिका पर खर्च किया, जबकि स्वास्थ्य पर उसका खर्च 14% था। वहीं, गुजरात ने 0.6% न्यायपालिका पर और 2.92% स्वास्थ्य पर खर्च किया। 

पेंडिग केस
देश में 3.3 करोड़ केस पेंडिंग हैं। इनमें से 2.84 करोड़ केस निचली अदालतों में पेंडिंग हैं, 43 लाख हाईकोर्ट में और 57 हजार सुप्रीम कोर्ट में। सुप्रीम कोर्ट में पेंडिंग 15 हजार केस ऐसे हैं जो पांच साल से ज्यादा पुराने हैं। औसतन निचली अदालतों में हर साल दो करोड़ केस पहुंचते हैं। 

जजों की कमी
भारत में 15 हजार 608 जज हैं। किसी भी देश में जजों की यह सबसे ज्यादा संख्या है। सुप्रीम कोर्ट में फिलहाल 22 जज हैं। विधि आयोग, संसदीय समिति और सुप्रीम कोर्ट के मुताबिक हर 10 लाख की आबादी पर 50 जज होना चाहिए। फिलहाल यह संख्या 13 जजों की है। हर भारतीय जज औसतन 2600 केस एक साल में निपटाता है। जबकि अमेरिका का जज एक साल में 81 केस पर काम करता है। नेशनल कोर्ट मैनेजमेंट सिस्टम रिपोर्ट (2012) के मुताबिक, पिछले तीन दशकों में जज की नियुक्तियां छह गुना बढ़ी हैं। जबकि नए केस दर्ज होने की संख्या 12 गुना बढ़ी। अनुमान है कि अगले 30 सालों में 15 करोड़ नए केस कोर्ट तक पहुंचेंगे जिन पर फैसले के लिए 75 हजार जजों की जरूरत होगी। 

इंफ्रास्ट्रक्चर
निचली अदालतों में 5018 कोर्ट रूम की जरूरत है। 2016 के आंकड़ों के मुताबिक मौजूदा 15 हजार 540 कोर्ट हॉल 20 हजार 558 न्यायिक अफसरों के लिए नाकाफी हैं। वहीं, निचली अदालतों के जजों के लिए 8 हजार 538 आवासों की कमी है। इसके अलावा कोर्ट स्टाफ की कमी भी बड़ा मसला है, जिसकी संख्या फिलहाल 41 हजार 775 है।  

वित्त आयोग
न्यायपालिका के इंफ्रास्ट्रक्चर को सुधारने के लिए 13 वें वित्त आयोग ने पांच हजार करोड़ रुपए दिए थे। इसमें से 80% खर्च नहीं किए गए। 14वें वित्त आयोग से 2014 में नौ हजार करोड़ रूपए न्यायपालिका के लिए मांगे गए, लेकिन इससे इनकार कर दिया गया।