जोधपुर: राजस्थान की राजनीति के गढ़ माने जाने वाले मारवाड़ की सबसे महत्वपूर्ण सरदारपुरा सीट पर हर बार चुनाव जीतने वाले पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को पटखनी देने के लिए भाजपा किसी ऐसे प्रभावित उम्मीदवार की तलाश कर रही है जो हर हाल में यह सीट निकाल सके। भाजपा हर बार के चुनाव में न केवल चेहरे बदल रही है बल्कि रणनीति भी बदलती आ रही है मगर गहलोत को हराना भाजपा के लिए आज भी बड़ी चुनौती बनी हुई है।

राजस्थान में इसी साल होने वाले विधानसभा चुनाव को लेकर जहां भाजपा और कांग्रेस में जिताऊ चेहरों की तलाश हो रही है वहीं जोधपुर के सरदारपुरा सीट भाजपा के लिए सिरदर्द बनी हुई है यहां पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत लगातार चार बार जीतते से आ रहे हैं इसीलिए कोई भाजपा नेता उनके सामने टिक नहीं पा रहा है। कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव रहते हुए अगर चुनाव गहलोत को नहीं लडाया जाता है तो एक अलग बात है अगर गहलोत चुनाव लड़ते हैं तो यह सीट भाजपा के खाते में इस बार भी आना मुश्किल ही माना जा रहा है। क्योकि गहलोत की लोकप्रियता आज भी पहले की तरह खुद की गृह जिले में बरकरार है।

अंदरूनी तौर पर चर्चा में कुछ नाम
लेकिन जोधपुर जिले की सरदारपुरा सीट से भाजपा की ओर से दावेदारों के नाम अभी खुलकर सामने नहीं आ रहे हैं। यहां से जोधपुर विकास प्राधिकरण के अध्यक्ष  महेंद्र सिंह व पूर्व भाजपा जिलाध्यक्ष नरेंद्र कछवाहा का नाम अंदरूनी तौर पर  चर्चा में चल रहा है मगर कोई भी सिर्फ हारने के लिए चुनाव लड़ने को तैयार नहीं है। भाजपा को हर बार यहां से हार का सामना करना पड़ा। भाजपा हर चुनाव में यहां जाति कार्ड के साथ प्रत्याशी बदलने की भी रणनीति अपनाती रही है। गहलोत अपनी परम्परागत सीट सरदारपुरा से ही लड़ते रहे हैं और चार चुनाव लगातार जीते हैं। यहां कांग्रेस से पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की एकमात्र दावेदारी रहती हैं। ऐसे में कांग्रेस में अन्य नाम नगण्य ही हैं।
पहली बार 1998-99 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस का बहुमत आने पर अशोक गहलोत को मुख्यमंत्री बनाया गया। लेकिन वे चुनाव नहीं लड़े थे। तब सरदारपुरा से मानसिंह देवड़ा ने अपनी सीट खाली कर गहलोत को दी। उस समय भाजपा ने मेघराज लोहिया को मैदान में उतरा था। गहलोत ने लोहिया को 49280 वोटों से शिकस्त दी थी।

भाजपा की प्रत्याशी बदलने की परंपरा
उसके बाद वर्ष 2003 में कांग्रेस से अशोक गहलोत दूसरी बार मैदान में उतरे तो भाजपा ने प्रत्याशी बदल दिया और इस बार अर्थशास्त्री महेन्द्र कुमार झाबक पर दावं खेला। लेकिन भाजपा का यह दावं फेल साबित हुआ और गहलोत दूसरी बार 18991 मतों से जीत गए। उसके बाद वर्ष 2008 में गहलोत के सामने भाजपा ने फिर रणनीति बदली। यहां इस बार जाति कार्ड खेला गया। यह सीट माली बाहुल्य मानी जाती है। इस सीट से अब तक चुनाव में माली समाज का प्रत्याशी ही जीतता रहा है। ऐसे में भाजपा ने भी माली प्रत्याशी के सामने माली समाज का उम्मीदवार ही उतरा। इस चुनाव में पूर्व मंत्री राजेन्द्र गहलोत को भाजपा का प्रत्याशी बनाया। लेकिन वे भी अशोक गहलोत के सामने टिक नहीं पाए और 15340 मतों से पराजित हो गए।

जीत की हैट्रिक लगा चुके और दो बार मुख्यमंत्री बनने के बाद वर्ष 2013 में गहलोत इसी सरदारपुरा सीट से कांग्रेस के प्रत्याशी बने। भाजपा ने फिर अपनी रणनीति बदली। इस बार राजपूत प्रत्याशी शंभूसिंह खेतासर को मैदान में उतारा गया। खेतासर वर्ष 2008 में ओसियां से निर्दलीय के रूप में विधानसभा व पाली लोकसभा क्षेत्र में बसपा की सीट से सांसद का चुनाव लड़ चुके थे। लेकिन दोनों बार ही हार का मुंह देखा। वर्ष 2013 में सरदारपुरा सीट से भाजपा ने खेतासर को अपना प्रत्याशी बनाया। इस चुनाव में मोदी की जबरदस्त लहर थी। कांग्रेस जिले की दस सीटों में से नौ सीट पर हार गई, लेकिन केवल गहलोत ही अपनी सरदारपुरा सीट बचा पाए। 

उन्होंने खेतासर को 18478 वोटों से पराजित किया। कांग्रेस के संभागीय प्रवक्ता अजय त्रिवेदी जहां पश्चिमी राजस्थान में 33 में से 33 सीटे लाने के लिए पूजा पाठ करने में जुटे हैं वही गहलोत को लेकर कहते भी है कि वे इतने सरल है कि भाजपा वाले भी उन्हें वोट दे जाते है वहीं भाजपा के युवा नेता नरेश सुराणा का कहना है कि यह बात सही है कि अशोक गहलोत कद्दावर नेता है पर यहां उन्हें हराना हमारे लिए बड़ी चुनौती है मगर इस बार मुकाबला करने के लिए भाजपा पूरी तरह से तैयार है और इसीलिए सशक्त उम्मीदवार की तलाश चल रही है।

सरदारपुरा बनी गहलोत की परम्परागत सीट
उल्लेखनीय है कि सरदारपुरा को गहलोत की परम्परागत सीट माना जाता रहा है। लेकिन भाजपा ने हर बार प्रत्याशी बदला है। ऐेसे में इस चुनाव में कांग्रेस तो लगभग निश्चिंत हैं, भाजपा से दावेदार कौन? यह सवाल फिर से चुनावी हलचल में गूंजने लगा है। भाजपा भी ऐसे दावेदार की तलाश में है, जो मजबूती से गहलोत को टक्कर दे सके। हालांकि भाजपा से इस सीट पर पांच-सात नाम प्रमुखता से सामने आ रहे हैं। इनमें कुछ नाम तो वे हैं जो चुनाव लड़ चुके हैं, और कुछ नाम वर्तमान में अभी जिम्मेदार पदों पर हैं। देखना यह है कि भाजपा पुराने चेहरों पर दावं खेलेगी या कोई नया प्रत्याशी सामने लाएगी।