भरतपुर: बूंद-बूंद पानी का उपयोग करने के महत्व को हमारी सरकार ने भले ही अब जाकर समझा है। लेकिन, भरतपुर ने सन् 1722 में ही जल स्वावलंबन को अपना लिया था। जिले में कोई बारहमासी नदी नहीं होने के बावजूद बरसाती नदियों के पानी को 338 मिट्टी के बांधों से रोका।

जल प्रबंधन की यह ऐसी इंजीनियरिंग थी जिसे देखकर चीन और इजरायल तक हैरान रह गए। इन देशों के विशेषज्ञों ने हमारी इंजीनियरिंग को समझा, उसका अध्ययन किया और अपने यहां पाठ्यक्रम में भी शामिल किया। इसे भरतपुर जल प्लावन सिंचाई योजना के नाम से पढ़ाया जाता है।

इन देशों में इस सिस्टम को कई जगह अपनाया गया। लेकिन, दुर्भाग्य है कि उचित रखरखाव और ध्यान नहीं देने के कारण आज 338 में से 243 बांध ही रिकार्ड में रह गए हैं। शेष 56 बांधों का तो अब अता-पता भी नहीं है। लगभग 18 वीं सदी में जब इंजीनियरिंग की कोई विधिवत शिक्षण व्यवस्था नहीं थी।

तब हमारे पूर्वजों ने अपने व्यवहारिक ज्ञान के बल पर भरतपुर को बर्बाद करने वाली बरसाती नदियों का उचित प्रबंधन किया। शुरुआत महाराजा सूरजमल के कार्यकाल से हुई और 1826-1894 में महाराजा बलवंत सिंह, महाराजा जसवंत सिंह और महाराजा रामसिंह के समय इस सिस्टम पर विशेष ध्यान दिया गया।

भरतपुर की सिंचाई प्रणाली वास्तव में जल प्लावन योजना है। जिसमें पानी एक-एक बूंद का उचित ढंग से उपयोग किया जाता है। जिसे अब राज्य सरकार ने प्रदेशभर में अपनाया है। इसलिए बरसाती पानी को स्थानीय जल ग्रहण क्षेत्रों (बांध, एनीकट आदि) में संग्रहित करके एक-एक बूंद का उपयोग किया जा रहा है।

भरतपुर में केवल बांध बारैठा स्टोरेज बांध है। जबकि अन्य बांध मानसून जल प्रबंधन का ही हिस्सा हैं। इनमें 15 जून से 15 सितंबर तक ही पानी रखा जाता है। इसके बाद सिंचाई के लिए पानी देकर इनके पेठा काश्त के लिए खाली कर दिए जाते हैं। यानि, फिर इनमें खेती भी की जा सकती है।

रियासतकाल में 338 बांध थे, उचित देखभाल न होने से अब 243 ही रह गए
रियासतकाल में भरतपुर में मिट्टी के 338 बांध थे। इनमें से कई बांध तो क्षतिग्रस्त होकर खत्म हो गए। जल संसाधन विभाग अपने अधीन आने वाले 197 बांधों में से 158 बांधों का प्रबंधन वर्ष 2003-04 में पंचायतों को दे चुका है। जबकि शेष 39 बांधों की भराव क्षमता 2944.65 एमसीएफटी है। इसका सीसीए (सिंचाई योग्य क्षेत्र) 11671 हैक्टेयर है।

पंचायत विभाग से पहले विकास विभाग के पास 85 बांध थे। पंचायत विभाग को 158 बांध और मिलने के बाद इनकी संख्या 243 हो गई है। भरतपुर के बांधों को 5 श्रेणियों में बांटा हुआ है। प्रथम श्रेणी में 2500 एकड़ से अधिक क्षमता के 4 बांध हैं। जिनमें बारैठा बांध, सीकरी डायवर्जन, अजान बांध और नगला छीतरिया है।

ये हमारी इंजीनियरिंग की खासियत
भरतपुर के सिंचाई सिस्टम की खासियत इसकी कनेक्टिविटी ही है। बरसाती नदी कुकंद, बाण गंगा, गंभीर, रूपारेल के वेग को मिट्टी की विभिन्न नहरों, झीलों और बांधों के जरिए इस तरह आपस में जोड़ा गया कि उनका पानी बेकार बहकर नहीं जाए। बल्कि उसे जगह-जगह संग्रहित किया गया। इससे पानी का वेग नियंत्रित कर गांवों में होने वाली बाढ़-बर्बादी को रोका।

वहीं बांधों में मानसून सीजन 15 जून से 15 सितंबर तक पानी को रोक कर रखा। साथ ही नदी के साथ बहकर आई उपजाऊ मिट्टी को भी रोका गया। इस मिट्टी को खेतों में काम लिया गया। जबकि पानी से भूृ-जल स्तर बढ़ाकर जमीन में खार और दीमक जैसी समस्याओं को खत्म किया गया। इससे कृषि पैदावार बेहतर हुई। साथ पी कुओं के रीचार्ज होने से पीने को स्वच्छ और मीठा पानी मिला।